Pages

Friday, February 4, 2011

... यूं ही एक दिन

"...कितनी सुन्दर लगेगी, वैसे भी चंचल का रंग उस लड़की से ज्यादा साफ है। और फिर चंचल यकीनन उससे कई गुना सुंदर है", अचानक आशीष ठिठककर रुक गया "अरे मैं भी पागल ही हूं, क्या अपने आप से बड़बड़ाए जा रहा हूं। फिर मैने उस लड़की को देखा ही कहां। लेकिन जो भी है, सुनील ने बताया तो था कि वो लड़की जरा पक्के रंग की है लेकिन सुंदर है"। हल्की सी मुस्कान होंठों पर तैरने लगी और आशीष सिर झटककर आगे बढ़ गया। आज तो जैसे सारी दुनिया को चीरकर बस किसी तरह जल्द से जल्द घर पहुंचने को आतुर था आशीष। बेसब्र मन पंख लगाकर घर की चौखट पर जा गिरने को है।
हर रोज घर से बस स्टैंड और बस स्टैंड से घर तक के पैदल सफर में आशीष न जाने कितनी बार रास्ते में आने वाली लगभग हर चीज को मनभर गाली देता, कोसता। फिर चाहे वो सड़क के कोने में खड़ी फूस की अवैध झुग्गियां हों, ऊपर तक भरे गंदे नाले हों, प्रशासन की उन्हें हटाने में नाकामी की दास्तां हो, धूल-धुआं या फिर मंजिल तक पहुंचने की होड़ में भागती गाड़ियों का शोर। हर उस साये से नफरत है आशीष को जो इस गंदगी के करीब ले जाए उसे। कभी सरकार की विफलता, तो कभी शराब के ठेके पर धुत शराबियों का दिन भर की ढियाड़ी को जहर के गिलास पर मस्ती से उड़ाना, कभी पानी की बूंद-बूंद के लिए सड़क के बीच मारपीट तो कभी सर्द मौसम में दो चिथड़ों टांगे नंगे पांव साइकिल का टायर घुमाते बच्चे। मुश्किल से पंद्रह मिनट का वो रास्ता आशीष के लिए आधे घंटे में बदल जाता।
"इस इलाके में रहना अच्छा तो नहीं लगता यार लेकिन क्या किया जाए। साली नौकरी की मजबूरी और तंग हाथ सब कुछ कराता है", आशीष अपने दोस्त सुनील से रोज यही कहता।
लेकिन आज... आज बात कुछ और ही है। कुछ सोचकर मन की तरंगें कुलांचे भरने लगीं। पैरों का भारीपन, ऑफिस की थकान और झुग्गी का वो उबाऊ माहौल, कुछ भी तो उसे विचलित नहीं कर पा रहा है। आज उसकी आंखों के सामने प्यारी सी चंचल खड़ी है। सुर्ख गुलाबी सूट में और हां... वही गुलाबी सैंडि़ल भी पहनी है छुटकी ने। वो घूम रही है बार-बार। थोड़ा आगे चलती, थोड़ा पीछे फिर किसी फिल्म की हीरोइन की तरह बलखाकर चाल दिखाती। "... अरे अरे जरा संभलकर। गिर जाओगी" कहकर आशीष ने झट से दोनों हाथ रक्षात्मक मुद्रा में आगे बढ़ा दिए। नजरें इधर-उधर दौड़ाईं तो चंचल ओझल हो चुकी थी।
आशीष शरारती मुस्कान चेहरे पर लिए आगे बढ़ गया। लेकिन ये क्या... घर की तरफ बढ़ते कदम अचानक धीमे क्यों पड़ गए? उमंगों के इस शांत सागर में दूर से चली आ रही इन विरोधाभाषी लहरों का रुख इस ओर क्यों है? "ये मुझे क्या हो रहा है। एक पल पहले तक तो मैं खुशी के सागर में डुबकियां लगा रहा था लेकिन फिर दूसरे ही पल मन उदास सा क्यों होने लगा है" आशीष को कुछ समझ में नहीं आया। उसने सिर नीचे किया फिर उंगलियों को बालों में पीछे की ओर नचाया और बस... उदासी की वजह गुलाब दुपट्टा ओढ़े सामने ही खड़ी थी। जिस अनचाहे डर को बस से उतरकर इतनी देर से भुलाने की कोशिश करता रहा आशीष, वही डर उसके सपनों की रंगीन दुनिया को काला करने की कोशिश में कामयाब हो रहा था।
अभी कुछ देर पहले की ही तो बात है। हर एक सीन उसकी आंखों के आगे नाचने लगा। सुनील के साथ घर वापस लौटते हुए किस्मत से आज बस में एक सीट खाली मिली। धप्पाक से मैं उस सीट पर बैठ गया। आधे घंटे बाद एक तेज झटके ने मेरी नींद तोड़ दी। मेरे चेहरे पर गुस्से और फिर खुशी के मिले जुले भाव उभर आए। गुस्सा नींद टूटने की झुंझलाहट का साक्षी था और खुशी मिली मुझे उस भीनी सी परिचित खुशबू से। गर्दन घुमाकर अपनी बायीं ओर देखा तो ठीक मेरे सामने गुलाबी सूट पहने एक लड़की भीड़ में जगह पाने की जद्दोजेहद में थी। एक बारगी तो मन हुआ कि उठ जाऊं और फिर मैं लेडीज़ सीट पर बैठा था लेकिन रास्ते की दूरी के अहसास ने त्याग की बलवती इच्छा को दबा दिया। उस लड़की का चेहरा तो नहीं देख पाया लेकिन उसी गुलाबी सूट में सजी अपनी छुटकी की कल्पना जरूर की। कब से पीछे पड़ी है "भइया गुलाबी सूट और गुलाबी सैंडिल ला दो ना"। बिल्कुल... इस बार तो छुटकी की इच्छा गुलाबी चुनरी जरूर ओढ़ेगी। आखिर बोनस के पैसों से सबसे पहला काम यही तो करना है। ये सोचकर आशीष की आंखों में चमक आ गई। इसी बीच बस में हलचल के साथ शोर-शराबा बढ़ गया था। कुछ मनचले शायद बहुत देर से गुलाबी सूट वाली लड़की को छेड़ रहे थे। मेरी सीट के पास खड़े सुनील ने मुझे कोहनी मारकर कहा " देख ना आशु, उसका यार भी आ गया है पीछे से। हां भाई... इस जैसी सुंदरी को बचाने नहीं आएगा तो क्या तुझे या मुझे बचाएगा। वैसे बड़ा किस्मत वाला है जो ऐसी पटाखा मिली है, क्या कहते हो"? शोर बढ़ रहा था। देखते ही देखते बात हाथापाई पर उतर आई। भीड़ की वजह से ज्यादा तो कुछ नहीं देख पाया हां लेकिन उन बदमाशों ने लड़की का दुपट्टा खींचकर उसे बस से नीचे धक्का दे दिया। लड़की का दाया हाथ विपरीत दिशा में तेजी से आते एक दुपहिया स्कूटर के नीचे आ गया। लड़की चिल्लाती रही। मैं, सुनील और बस में बैठे सभी यात्री चुप थे। बुत बनकर केवल तमाशा देखा जा रहा था। "ओफ्फ यार... मैं ही अकेला क्या करता। और भी तो लोग थे बस में, सभी चुप थे। और फिर उन सालों का क्या भरोसा। कहीं चाकू-छुरी निकाल लेते तो फालतू में मैं तो जाता ना जान से। और फिर वो लड़की भी कुच वैसी ही लगी। कोई दूध की धूली हुई तो नहीं थी आखिर अपने ब्यॉयफ्रेंड के साथ जो थी। जाने घरवालों से क्या बोलकर निकली थी। छि: क्या जमाना आ गया है"। ऐसी-वैसी ढेर सारी बातें मन में सोचकर उस उमड़ते काले तूफानी साए को आशीष ने शांत करने की भरपूर कोशिश की। आशीष सोच में ही डूबा था कि उसे अहसास हुआ कि उसके कदम घर की चौखट पर आ पहुंचे हैं। उसे थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ क्योंकि घर का दरवाजा अधखुला था। बैग सोफे पर फैंका और टाई ढीली करते हुए चिल्लाया- छुटकी...छुटकी... अंदर से कोई आवाज नहीं आई। आशीष कुछ सोचकर मुस्कुराया। "अच्छा बाबा छुटकी नहीं, तू अब बड़ी हो गई है। नाराज मत हो मैं तुझे तेरे नाम से ही बुलाऊंगा। चंचल अब तो बाहर आ और हां वो कांच के गिलास में ही पानी लाना"।
बहुत देर तक कोई हलचल ना होने पर आशीष का मन किसी आशंका के डर से घबराया। वो उठा और चंचल का कमरा, किचन, अपना कमरा, घर के पीछे छोटा सा बगीचा सभी जगह टटोला। " घर तो खाली है आखिर कहां गई चंचल"। तभी घड़ी ने आठ बजे का घंटा बजाया और चिंता की लकीरें उसकी माथे पर गहरा गईं। शायद जिस तूफान की आशंका उसे सता रही थी वो आ चुका था। आशीष ने खुद को उस तूफान की गिरफ्त में कसता हुआ महसूस किया। अचानक किसी के कदमों की आहट ठंडी पवन का झोंका संग लेकर आई। उसने सिर उठाया तो देखा कि मां सामने खड़ी है। मां के पैरों में दोनों हाथ टिकाककर उसने कहा "पाय लागू मां, अरे आप... कब आईं ? मुझे फोन कर देतीं, मैं स्टेशन पर लेने आ जाता। अच्छा आपने ही छुटकी को कहीं भेजा होगा और मैं कबसे चिंता कर रहा था"। ये सब आशीष ने एक सांस में ही कह डाला जैसे कुछ भी नकारात्मक सुनने से खुद को रोक रहा हो। फिर पलटा और मां के लिए एक गलास ट्रे में रखकर वहीं एक कोने में बोनस समेत अपनी सैलेरी सजा दी।
"आशु बेटा, मैं तो सुबह ही आ गई थी। पड़ोस का संजू ही मुझे स्टेशन पर लेने पहुंच गया था। इस बार छुटकी के लिए उसका मनपसंद गुलाबी सूट और सैंडिल ले ही आई। सोचा क्या करेंगे पैंशन के पैसों का जब छुटकी के असमान भी पूरे ना कर पाए तो। मन पक्का किया और बड़े बाजार से सस्ते सौदे में ले आई। वही पहनकर तो गई है सुषमा को चिढ़ाने। और बेटा अकेली थोड़े ही गई है हमारा गबरू जवान संजू भी तो उसके साथ गया है। जिद करने लगा, मैं भी दीदी के साथ जाऊंगा। मैं उसी के घर से तो आ... "। मां शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि आशीष के हाथों से डगमगाती ट्रे जमीन पर गिर गई। कांच का गिलास छिटटकर कई टुकड़ों की शक्ल में कमरे में फैल गया। उसकी आंखों के सामने अब घुप्प अंधेरा था। लगा कि जैसे कमरे में वो अकेला है। बेसहारा, बेबस। वो प्यारी सी छुटकी की आकृति... गुलाबी सूट में जाने क्यों धीरे धीरे दूर जा रही थी। और सूट की दायीं बाजू में ये लाल रंग कैसा है। और ठीक उसी पल वो शर्मनाक वाकया उसकी आंखों के सामने तैर गया। आशीष चिल्लाया " मैं उसे बचा सकता था। मैं... मैं अगर हिम्मत करता तो चिल्लाकर भीड़ इकठ्ठी कर सकता था। शायद वो गुंडे डर जाते। वो लड़की... वो गुलाबी सूट बच जाता। हे भगवान, उस लड़के ने मेरी छुटकी को बचा लिया हो। शुक्र है कोई तो था छुटकी के साथ"। मां बेहद आश्चर्य से आशीष को निहार रही थी। एक दो बार उसे सम्भालने की नाकाम कोशिश भी की। आशीष से ध्यान हटा तो मां ने ट्रे की तरफ देखा तो सफेद लिफाफा पूरी तरह भीग चुका था और अंदर पड़े नोट भी। मां जल्दी से भीगे नोट बटोरने लगी।
"बहुत देर हो चुकी है मां। कोई फायदा नहीं... कोई फायदा नहीं", बड़बड़ाता हुआ आशीष दरवाजे की तरफ गया और नंगे पांव ही गंदी बस्ती की तरफ दौड़ पड़ा।

3 comments:

बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना said...

रोज़ की समस्या ...प्रति क्षण की समस्या ...और नामर्द होते हमारे समाज को आइना दिखाने का सफल प्रयास किया है आपने .....एक समस्या को पूरी शिद्दत के साथ उठाती आपकी कहानी साहित्य की सभी शर्तों को पूर्ण कर रही है .......
फिर भी बधाई नहीं दूँगा इसके लिए ......आपकी संवेदनाओं को बधाई के तराजू में तौल कर बनियागीरी करने की शक्ति नहीं है मेरी. बस ....आपको मेरा एक मौन नमन !

यशवन्त माथुर said...

कल 08/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

सु-मन (Suman Kapoor) said...

bahut achcha likha hai...