सखी सइंया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाए जात है
अपने आमिर भाई की नई फिल्म का गाना है... भई गाना सुनके हम तो हो गए चित। कमाल है भइया। वैसे कमाल तो हमारी गली में रहने वाली भौजी भी है। हमारे साथ भौजी ने भी ये गाना सुना। अजी गाना क्या सुना, भौजी के दिल को छू गया। बस हर दूसरे भजन कीर्तन के समापन पर यही गाना गाया जाता है। नहीं नहीं मैं आमिर की नई फिल्म की डिस्ट्रिब्यूटर नहीं हूं, मैं तो आपको वो कमाल का वाकया सुनाने जा रही हूं जो इस गाने से जु़ड़ा हुआ है। अब हुआ यूं कि कल भौजी ढोलक की थाप पर जब महंगाई डायन को कोस रही थीं तो अचानक दरवाजे पर खूब सजी संवरी कड़क सूती साड़ी में एक महिला आकर खड़ी हो गई। वो कौन है क्या काम है भौजी समेत सभी औरतें ये तो बाद में पूछतीं, पहले तो नजर उसकी साड़ी, उसकी महंगे कीमती गहने और उसके पर्स पर जाकर टंग गईं। उनके मुंह खोलने से पहले ही वो औरत चिल्लाने लगी
- मैं कहती हूं किसने कहा मुझे डायन. किसकी इतनी हिम्मत हुई। अभी तो मेरे एक वार से सिर्फ कमर ही टूटी है ज्यादा चूं-चपड़ की ना तो हमेशा के लिए बिस्तर पर बिठा दूंगी... महंगाई है मेरा नाम हां...
भौजी की प्यासी नजरों ने जब मन भर कीमती गहनों और कपड़ों का स्वाद चख लिया तो होश आया। वो भी गुर्राने लगी
- अच्छा तो मुई तू है वो महंगाई। तभी मैं कहूं इस जमाने में इतने कीमती गहने और ये सजीला पर्स कहां तो आया। पहले से ही मुसीबतें कम थीं जो ससुरी तू भी आ गई जान खाने को।
महंगाई - क्या... मुझे गाली दी। तुम्हारी इतनी हिम्मत। अब देखो जरा डीजल, पैट्रोल तो पहले ही तुम फटीचरों की जेब से दूर चला गया है अब पानी, बिजली को भी तरसोगे तुम।
भौजी- अरे जा जा तेरी इतनी औकात कहां। ये तो भला हो दिल्ली सरकार का जिसने सब्सिडी हटाकर पानी बिजली हम गरीबों के लिए महंगी कर दी वरना इसका श्रेय भी तुझ डायन को ही जाता। और तू क्या हमको मसलेगी री, पहले तो घर से निकलते ही मोहल्ले के बेरोजगार लड़के ही जेब पर हाथ साफ कर देते हैं। या फिर सड़क पर चलते हुए तरह तरह के मजहबी विस्फोट से कब घर का कमाईदार चल बसे कुछ ठीक नहीं। ससुरी किस्मत अच्छी हुई और आदमी बच जाए तो जगह-जगह खुदी सड़कों और गड्डों से कइसे बचेगा। और गर किस्मत में ही छेद हो और जिंदगी बची रहे तो रहा सहा तेल तो इश्क का भूत ही उतार देत है। कर के देख लो जरा मां-बाप की मरजी से प्यार महोब्बत बस जान खुंखरी पर समझो। ई सब से कोई बच जाए तो हम रामदुलारी के घर महरी बन जाएं कसम से। तुम्हारा नंबर तो ए सब के बाद आवत रहै समझी. और ऊ भी तब जब कि हम सब महोल्ले की औरतें शीला बहन के घर रात को टीवी पर नाटक ना देख लें। कसम से ससुरा इतना रुलात है इतना रुलात है कि कौनो और चीज सोचने का मन ही ना करे। बाकी रहा सहा तुम मसल लो मौज से।
महंगाई- साला किस्मत से ही खोटी हो तुम सब। तुमको क्या लूटा जाए। लुटे लुटाए हो। बजाओ यार, बजाओ... आज मैं भी झूमके नाचूंगी। तुम सब की बर्बादी पर।
और फिर क्या... भौजी के ही मुंह से सुना वो डायन महंगाई ढोल की थाप पर खूब जमके नाची। और जाने कैसे लेकिन नाचते नाचते उसका आकार लगातार बढ़ रहा था।
Wednesday, July 7, 2010
Wednesday, June 30, 2010
ये क्या हुआ ?
न उनको हमसे परेशानी
ना हमको उनसे शिकवा
बस बात नहीं होती अब
ना नजरों से ना जुबानी
ना खैर पूछते, ना बताते ही खता
कल, परसों फिर आज भी किया
रोजाना करते हैं रह रह कर हम
उनसे ख्वाबों में गिला
हम समझ नहीं पाते, ना वो कह पाते
कह पाते कि क्यों है हालात यूं ख़फ़ा
कहने को है ही क्या, जानते हैं माजरा सारा
कि आसार अच्छे नहीं, वहां भी यहां भी
दूर थे तो पास आने की थी बेकरारी
बेगानी सी लगती थी कायनात सारी
पर अब क्या ?
पास हैं तो...
नजदीकियां दम घोंटने लगी हैं
ना हमको उनसे शिकवा
बस बात नहीं होती अब
ना नजरों से ना जुबानी
ना खैर पूछते, ना बताते ही खता
कल, परसों फिर आज भी किया
रोजाना करते हैं रह रह कर हम
उनसे ख्वाबों में गिला
हम समझ नहीं पाते, ना वो कह पाते
कह पाते कि क्यों है हालात यूं ख़फ़ा
कहने को है ही क्या, जानते हैं माजरा सारा
कि आसार अच्छे नहीं, वहां भी यहां भी
दूर थे तो पास आने की थी बेकरारी
बेगानी सी लगती थी कायनात सारी
पर अब क्या ?
पास हैं तो...
नजदीकियां दम घोंटने लगी हैं
Tuesday, June 29, 2010
शब्दों का संसार
शब्द जो खींचकर पीछे ले जाएं
शब्द जो नाचने लगें पन्नों पर
जो अहसास हैं उस पल का
जब हर क्षण यादों की माला में
गुंथ रही थी मेरी दुनिया
शब्द जो बचपन के साथ मुस्कुराएं
तुतलाएं जिंदगी में घुलमिल जाएं
यादों की बारात ले आएं
निच्छल हंसी के लम्हे
जब सब कुछ नया-नया सा
अजीब अनोखा था
वो अहसास अनमोल है
अपने शहर से दूर जाने का अहसास
पहली नौकरी का अहसास
पहले प्यार का अहसास
अहसास विविधता में एकता का
या फिर एकता के ढोंग का
वो अहसास बंद है डायरी के पन्नों में
पन्ने खोलते ही शब्द नाचने लगते हैं
और वो खोये लम्हे, वो बीते पल
खुद को दोहराने लगते हैं
तब, मन हरा हो जाता है
और पलकें नम
शब्द जो नाचने लगें पन्नों पर
जो अहसास हैं उस पल का
जब हर क्षण यादों की माला में
गुंथ रही थी मेरी दुनिया
शब्द जो बचपन के साथ मुस्कुराएं
तुतलाएं जिंदगी में घुलमिल जाएं
यादों की बारात ले आएं
निच्छल हंसी के लम्हे
जब सब कुछ नया-नया सा
अजीब अनोखा था
वो अहसास अनमोल है
अपने शहर से दूर जाने का अहसास
पहली नौकरी का अहसास
पहले प्यार का अहसास
अहसास विविधता में एकता का
या फिर एकता के ढोंग का
वो अहसास बंद है डायरी के पन्नों में
पन्ने खोलते ही शब्द नाचने लगते हैं
और वो खोये लम्हे, वो बीते पल
खुद को दोहराने लगते हैं
तब, मन हरा हो जाता है
और पलकें नम
Sunday, January 17, 2010
सुख... का सवाल
... सोचती हूं, सुख क्या है? सपनों का महल मिल जाना, ऊंची पगार वाली नौकरी, नाम, रुतबा या फिर प्रेमी से मिलन। आखिर क्या है सुख। कभी जिस उद्देश्य के पीछे मन बहुत देर से भाग रहा होता है और वो चीज हाथ में आ जाए तो मन खुश लेकिन फिर दूसरा उद्देश्य, कुछ और चाहत और एक नई मंजिल।
कहां ना जाने कहां भागता है मन। कभी किसी के टॉप क्लास ब्रांडेड कपड़ों में अटक जाता है तो कभी किसी के खूबसूरत घर पर... तो कभी लगता है कि कोई खास आपकी भावनाओं को बिन बोले ही समझ जाए। और ना समझे तो खीझ और झुंझलाहट से मन भर जाता है। यार इतनी इच्छाएं करता ही क्यों है मन। भौतिकवाद है, सब समझते हैं लेकिन ये जो मन है ना मानता ही नहीं। सब चाहिए इसे सब तब भी अधूरा, खाली खाली सा और प्यासा ही दिखता है। बस भागता रहता है एक को छोड़कर दूसरे की तरफ और दूसरे से ना जाने कहां-कहां? आकांशाओं और इच्छाओं की अंधाधुंध दौड़ आखिरकार अंधकार में पटक देती है... बहुत समझदार होते हुए भी शायद खुद से या दूसरों से लगाई गई अति इच्छाओं के बोझ से बौरा जाता है ये मन। अकेलेपन की कीचड़ से सना शरीर और अवसाद भरा मन लिए फिर इंसान कहीं जाने के लायक नहीं रह जाता। पहले तो उसे सामने खड़ी खुशी नहीं दिखती है बेकाबू मन को खुले सांड की तरह यहां वहां दौड़ने की छूट दे दी जाती है और फिर जब मन संभाले नहीं संभलता तो धोबी का कुत्ता बन जाते हैं। मेरे ख्याल से भागते मन का एक ही तोड़ है संतुष्टि। संतुष्ट रहकर पल पल का मजा लीजिए। जो है उसी में खुश रहिए। लेकिन फिर सोचती हूं कि संतुष्टि विकास के रास्ते में रोड़ा ना बन जाए। भई अब ये आपके ऊपर है कि कितना संतुष्ट रहकर आप विकास की गाड़ी में धक्का लगा सकते हैं... खैर... लगता है बहुत सोचती हूं... ना सोचूं भी तो क्या, कुछ नहीं लेकिन फिर मन में फंसी गांठ मुझे ही छीलकर रख देगी...
कहां ना जाने कहां भागता है मन। कभी किसी के टॉप क्लास ब्रांडेड कपड़ों में अटक जाता है तो कभी किसी के खूबसूरत घर पर... तो कभी लगता है कि कोई खास आपकी भावनाओं को बिन बोले ही समझ जाए। और ना समझे तो खीझ और झुंझलाहट से मन भर जाता है। यार इतनी इच्छाएं करता ही क्यों है मन। भौतिकवाद है, सब समझते हैं लेकिन ये जो मन है ना मानता ही नहीं। सब चाहिए इसे सब तब भी अधूरा, खाली खाली सा और प्यासा ही दिखता है। बस भागता रहता है एक को छोड़कर दूसरे की तरफ और दूसरे से ना जाने कहां-कहां? आकांशाओं और इच्छाओं की अंधाधुंध दौड़ आखिरकार अंधकार में पटक देती है... बहुत समझदार होते हुए भी शायद खुद से या दूसरों से लगाई गई अति इच्छाओं के बोझ से बौरा जाता है ये मन। अकेलेपन की कीचड़ से सना शरीर और अवसाद भरा मन लिए फिर इंसान कहीं जाने के लायक नहीं रह जाता। पहले तो उसे सामने खड़ी खुशी नहीं दिखती है बेकाबू मन को खुले सांड की तरह यहां वहां दौड़ने की छूट दे दी जाती है और फिर जब मन संभाले नहीं संभलता तो धोबी का कुत्ता बन जाते हैं। मेरे ख्याल से भागते मन का एक ही तोड़ है संतुष्टि। संतुष्ट रहकर पल पल का मजा लीजिए। जो है उसी में खुश रहिए। लेकिन फिर सोचती हूं कि संतुष्टि विकास के रास्ते में रोड़ा ना बन जाए। भई अब ये आपके ऊपर है कि कितना संतुष्ट रहकर आप विकास की गाड़ी में धक्का लगा सकते हैं... खैर... लगता है बहुत सोचती हूं... ना सोचूं भी तो क्या, कुछ नहीं लेकिन फिर मन में फंसी गांठ मुझे ही छीलकर रख देगी...
Wednesday, December 30, 2009
कमाल का 'अवतार'

साफ... स्वच्छ... निश्चल और स्पष्ट 'अवतार'... जी हां, फिल्म के आइडिया की बात कर रही हूं। कई के दृष्टिकोणों से फिल्म जांचने के बाद सबसे पहला मूल्यांकन विचार का ही करूंगी। अवतार का आइडिया ही खुद में पवित्रता समेटे हुए है। एक आम दर्शक की नज़र से फिल्म देखने पर कुल मिलाकर सब कुछ अच्छा लगा। कह सकते हैं खूबसूरत आत्मा में पिरोई गई नग्न सुंदर काया वाली फिल्म है अवतार। ये फिल्म आपको प्रकृति के करीब ले जाएगी। क्रंकीट के जंगलों में खोए लगातार दौड़ने वाले खिलाड़ी को ये फिल्म... पैसे की दौड़ में पीछे छूट रही प्रकृति को देखने और महसूस करने की समझ देती है... बताती है कि छोटे से पेंडोरा को कोपेनहेगेन के राक्षसों से खतरा है जो अपनी ऊंची रखने की खातिर मासूम प्रकृति को अनदेखा कर रहे हैं। कुछ और बातें हैं जिन्होने खासतौर से मुझे आकर्षित किया। तन पर वस्त्र ना होते हुए भी नीली स्वच्छ काया वाले लोग अश्लील नहीं लगते। गाय सा मासूम चेहरा और पानी सा साफ मन। प्रकृति की ही तरह रहस्यमय खूबसूरती में लिपटे लोगों की तुलना कपड़ों वाले इंसान से करना बेकार है। फिल्म का एक पात्र पेंडोरा के लोगों को नीला बंदर कहकर बुलाता है। मन में आया कि ये नीले बंदर हमसे कितने अच्छे और समझदार हैं। लोग कहते हैं कि कम कपड़ों में लड़की अश्लील लगती है और काम वासना को आमंत्रित करती है। उन सभी बेअक्लों को मेरी सलाह है कि एक बार अवतार जरूर देखें। प्रकृति को प्रणाम करने की खातिर निर्देशक ने 1200 करोड़ जरूर फूंके, लेकिन शायद ये जरूरी था... बेहद जरूरी। और अब जरूरत है प्रकृति से फिल्म के पात्रों का जो रिश्ता है उसे समझने की। खुद में उतारने की।
Monday, November 9, 2009
...सुनो लोगों
हां, और नहीं तो क्या, अब ये तो होना ही था... कलेजे में पड़ गई ना ठंडक, बचपन से पढ़ा होगा कि बोए पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए... लेकिन अक्ल ही अगर घास चरने गई हो तो फैसले कैसे लिए जा सकते हैं. विधानसभा में अपनी आवाज बनाकर दबंगों और गुंड़ों को भेजेंगे तो वहां विकास की तान तो छिड़ेगी नहीं, हां अलबत्ता गालीगलौज के सुर जरूर बुलंद हो सकते हैं, जैसा कि आज हुआ... आपको ये बात समझ में आती नहीं या समझना नहीं चाहते. जिन लोगों ने आज मातृभाषा का अपमान किया, विधानसभा में खुलेआम गुंडागर्दी दिखाई, स्पीकर की बेइज्जती करने के आम हो चुके नजारे को एक बार फिर दोहराया... मैं पूछती हूं कि उन्हें विधानसभा के गलियारों में पहुंचाया ही किसने... आपने ही ना॥ पहले से ही राज ठाकरे ने क्षेत्रियता की तुच्छ राजनीति के सहारे पूर्वांचलवासियों को बहुत सताया, उनसे मारपीट तक की। महाराष्ट्र छोड़ने की धमकी तक दी। हां शायद, तब आपकी समझ में क्यों आएगा? शरीर पर जख्म खाने वाला आपका कोई अपना नहीं था ना। वो तो यूपी या बिहार के थे, आपसे आपका हक...आपकी नौकरी छीनने के लिए महाराष्ट्र आए थे। लेकिन ये क्यों नहीं समझ में आया आपकी कि जिस राजठाकरे ने 'राज' की खातिर अपने रिश्तेदारों से खिलाफ ही बगावत का बिगुल फूंक दिया था वो नीति में नहीं सिर्फ और सिर्फ 'राज' का भूखा है। जानते तो आप ये भी थे कि खुद बालठाकरे और राजठाकरे मूलत: महाराष्ट्र के नहीं है। अरे जो अपने राज्य, अपने कुनबे का ना हो सका वो आपका क्या होगा। और आखिर क्यों होगा? उसे मतलब सत्ता से सत्तासुख से। आपको अपने बारे में तो सोचना चाहिए। वो क्यों आपके मुद्दे सदन में उठाएंगे और जनाब वक्त ही कहां है उनके पास ऐसे फालतू के कामों के लिए। बड़ा मुद्दा तो ये बन जाता है कि शपथ मातृभाषा हिंदी में क्यों ली जा रही है. सड़क और बसों में तो हिंदी बोलने में युवा पीढ़ी को शर्म आती ही है और अब तो औपचारिकता के लिए भी हिंदी बर्दाश्त नहीं हो रही है इन कपूतों। दोष इनका नहीं है दोषी आप हैं जिन्होने ऐसे गुंडों को चुनकर सदन में। सिर्फ एमएनएस की ही बात नहीं, मैं बात कर रही हूं संसद में बैठे तमाम गुनाहगारों की जो सत्ता की आड़ में शक्ति के मद में चूर बैठे हैं। वो बेवकूफ बनाते रहे और आप बनते रहे। अरे इस देश के पहले ही दो फाड़ हो चुके हैं। आज तक उस चोट का जख्म रिस रहा है और अब राज्य, क्षेत्र, मजहब और जाति की राजनीति की रोटियां सेक रहे नेताओं का जमाना है। शर्म बेचकर खा चुके ये गुंडे सदन या संसद में सिर्फ शोर मचाने के लिए जाते हैं। सदन में सत्र के पहले दिन उन्होने अपनी मंशा जाहिर कर दी। शर्म की बात ये तो भी है कि आज ही के दिन बर्लिन की मजबूत दीवार गिराकर जर्मनी को एकसूत्र में बांधने की पहल हुई थी और आज ही के दिन हिंदी-मराठी के नाम पर देश के टुकड़े करने की साजिश रची गई।
सुनिए और समझिए.... इस धरती के टुकड़े-टुकड़े होने से पहले जाग जाइए नहीं तो...
सुनिए और समझिए.... इस धरती के टुकड़े-टुकड़े होने से पहले जाग जाइए नहीं तो...
Monday, October 19, 2009
डर ही तो है...डरता क्यों है
बहुत खुश हूं तो कुछ लिख दूं
दुखी हूं तो कुछ लिख दूं
संतुष्ट हूं तो संतृप्ति का डर
क्यों भला मन रंगता है पन्नों को
इच्छा मन की, दोष कलम का
नाइंसाफी नहीं तो क्या है
फिर करूं भी तो क्या
उलझन की डोर यूं ही नहीं खुलती
लिखते लिखते मोड़ आते हैं
मिलते हैं रास्ते, शब्द जुड़ते हैं
कारवां बनता है
अचानक मंजिल मिल जाती है
फिर... वही संतुष्टि और संतृप्ति का डर
हां, शायद डर ही है
जो प्रेरणा देता है, हौसला बधांता है
कहता है बढ़ता चल
वरना निगल जाऊंगा तुझे
और मैं चलती चली जाती हूं
लिखती चली जाती हूं
डर के गर्भ से नई रचना का जन्म
अदभुत मगर सच
डर मेरे, तेरे सबके भीतर
मानो तो शक्ति, ना मानो तो भूत
..... तो बढ़ता चल... लड़ता चल
दुखी हूं तो कुछ लिख दूं
संतुष्ट हूं तो संतृप्ति का डर
क्यों भला मन रंगता है पन्नों को
इच्छा मन की, दोष कलम का
नाइंसाफी नहीं तो क्या है
फिर करूं भी तो क्या
उलझन की डोर यूं ही नहीं खुलती
लिखते लिखते मोड़ आते हैं
मिलते हैं रास्ते, शब्द जुड़ते हैं
कारवां बनता है
अचानक मंजिल मिल जाती है
फिर... वही संतुष्टि और संतृप्ति का डर
हां, शायद डर ही है
जो प्रेरणा देता है, हौसला बधांता है
कहता है बढ़ता चल
वरना निगल जाऊंगा तुझे
और मैं चलती चली जाती हूं
लिखती चली जाती हूं
डर के गर्भ से नई रचना का जन्म
अदभुत मगर सच
डर मेरे, तेरे सबके भीतर
मानो तो शक्ति, ना मानो तो भूत
..... तो बढ़ता चल... लड़ता चल
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