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Wednesday, July 7, 2010

ससुरी महंगाई और हमार भौजी

सखी सइंया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाए जात है
अपने आमिर भाई की नई फिल्म का गाना है... भई गाना सुनके हम तो हो गए चित। कमाल है भइया। वैसे कमाल तो हमारी गली में रहने वाली भौजी भी है। हमारे साथ भौजी ने भी ये गाना सुना। अजी गाना क्या सुना, भौजी के दिल को छू गया। बस हर दूसरे भजन कीर्तन के समापन पर यही गाना गाया जाता है। नहीं नहीं मैं आमिर की नई फिल्म की डिस्ट्रिब्यूटर नहीं हूं, मैं तो आपको वो कमाल का वाकया सुनाने जा रही हूं जो इस गाने से जु़ड़ा हुआ है। अब हुआ यूं कि कल भौजी ढोलक की थाप पर जब महंगाई डायन को कोस रही थीं तो अचानक दरवाजे पर खूब सजी संवरी कड़क सूती साड़ी में एक महिला आकर खड़ी हो गई। वो कौन है क्या काम है भौजी समेत सभी औरतें ये तो बाद में पूछतीं, पहले तो नजर उसकी साड़ी, उसकी महंगे कीमती गहने और उसके पर्स पर जाकर टंग गईं। उनके मुंह खोलने से पहले ही वो औरत चिल्लाने लगी
- मैं कहती हूं किसने कहा मुझे डायन. किसकी इतनी हिम्मत हुई। अभी तो मेरे एक वार से सिर्फ कमर ही टूटी है ज्यादा चूं-चपड़ की ना तो हमेशा के लिए बिस्तर पर बिठा दूंगी... महंगाई है मेरा नाम हां...
भौजी की प्यासी नजरों ने जब मन भर कीमती गहनों और कपड़ों का स्वाद चख लिया तो होश आया। वो भी गुर्राने लगी

- अच्छा तो मुई तू है वो महंगाई। तभी मैं कहूं इस जमाने में इतने कीमती गहने और ये सजीला पर्स कहां तो आया। पहले से ही मुसीबतें कम थीं जो ससुरी तू भी आ गई जान खाने को।

महंगाई - क्या... मुझे गाली दी। तुम्हारी इतनी हिम्मत। अब देखो जरा डीजल, पैट्रोल तो पहले ही तुम फटीचरों की जेब से दूर चला गया है अब पानी, बिजली को भी तरसोगे तुम।

भौजी- अरे जा जा तेरी इतनी औकात कहां। ये तो भला हो दिल्ली सरकार का जिसने सब्सिडी हटाकर पानी बिजली हम गरीबों के लिए महंगी कर दी वरना इसका श्रेय भी तुझ डायन को ही जाता। और तू क्या हमको मसलेगी री, पहले तो घर से निकलते ही मोहल्ले के बेरोजगार लड़के ही जेब पर हाथ साफ कर देते हैं। या फिर सड़क पर चलते हुए तरह तरह के मजहबी विस्फोट से कब घर का कमाईदार चल बसे कुछ ठीक नहीं। ससुरी किस्मत अच्छी हुई और आदमी बच जाए तो जगह-जगह खुदी सड़कों और गड्डों से कइसे बचेगा। और गर किस्मत में ही छेद हो और जिंदगी बची रहे तो रहा सहा तेल तो इश्क का भूत ही उतार देत है। कर के देख लो जरा मां-बाप की मरजी से प्यार महोब्बत बस जान खुंखरी पर समझो। ई सब से कोई बच जाए तो हम रामदुलारी के घर महरी बन जाएं कसम से। तुम्हारा नंबर तो ए सब के बाद आवत रहै समझी. और ऊ भी तब जब कि हम सब महोल्ले की औरतें शीला बहन के घर रात को टीवी पर नाटक ना देख लें। कसम से ससुरा इतना रुलात है इतना रुलात है कि कौनो और चीज सोचने का मन ही ना करे। बाकी रहा सहा तुम मसल लो मौज से।

महंगाई- साला किस्मत से ही खोटी हो तुम सब। तुमको क्या लूटा जाए। लुटे लुटाए हो। बजाओ यार, बजाओ... आज मैं भी झूमके नाचूंगी। तुम सब की बर्बादी पर।
और फिर क्या... भौजी के ही मुंह से सुना वो डायन महंगाई ढोल की थाप पर खूब जमके नाची। और जाने कैसे लेकिन नाचते नाचते उसका आकार लगातार बढ़ रहा था।

6 comments:

भारतवासी said...

तलाश जिन्दा लोगों की ! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!
काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

Unknown said...

maine aapka blog padha kush kya bahut kuch sikhne ko mila ! aar aapki lekhni me dam hai

VIVEK VK JAIN said...

bahut khoob

www.anaugustborn.blogspot.com

Unknown said...

Sir, lekhni mai to apki vakyibhut dam hai ,anteratma ko jagne vali hai apki lekhni.pr ek swal puchna chaungi k kya,kya desh ki in gambhir samasyaon ko maatr lekhni ke madhyam se door kiya ja sakta hai?????
Tamanna Sharma,Punjab
Email:tamannasharma76@gmail.com

मैं बोलूंगी खुलकर said...

tamanna ji, lekh matra se samasya door nahi ho sakti, lekin kahin to ek kadam udhana hi padega. ye samasya ko utane ka mera kadam hai. sarkar ko jo karna hai wo karegi

kanchan patwal

RAJNISH PARIHAR said...

very very good thinking!!!