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Saturday 29 October 2011

वो अनुभव...पहला पहला

जी हां, पता है कि बहुत दिन हो गए हैं लैपटॉप पर अंगुलियां नचाते हुए। बहुत पानी बह गया इन बीते दिनों में। बहुत कुछ बदल गया है; कुछ मेरे अंदर और बहुत कुछ मेरे आस-पास। हम दो से तीन हो गए। उसे अपने भीतर तो महसूस कर रही थी लेकिन सामने देखकर आंखें नम हो गईं। उसके नन्हे हाथों ने और कोमल अहसास ने सारे दुख भुला दिए। वो आया औऱ आते ही मुझे व्यस्त कर दिया। मेरी दुनिया को ढेर सारे रंगों से भर दिया। अब पता चला कि दुनिया की सबसे बड़ी खुशी क्या है। मुझे मेरे नाम से बढ़ाकर मां का दर्जा देकर उसने मुझे धन्य कर दिया। हर अनुभव पहला ही होता है लेकिन ये अनुभव हर मां को जीवन भर याद रहता है। मैंने अपने शरीर के इस हिस्से का नाम अंश रखा है। मुझे अहसास हो रहा है कि मुझ पर अब कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। उसे एक अच्छा इंसान, एक जिम्मेदार नागरिक औऱ संवेदनशील प्राणी बनाने का भार मुझ पर है। बात सिर्फ इतनी है कि एक नन्ही जान को जन्म देना ही बड़ी बात क्या है, बात तो उसे अच्छे संस्कार देना और अपने आस पास की दुनिया के समझने की सही समझ देना है। जो सिर्फ हम कर सकते हैं। तो क्यों नहीं हम उन्हें परियों की कहानी सुनाने के बदले अन्ना का संघर्ष सुनाएं। उन्हें देश पर प्राण न्योच्छावर करने वाले वीरों के बारे में बताएं। क्यों ना उन्हें असलहों के बदले कलम के महत्व से रूबरू करवाएं। मैं तो ऐसा करने वाली हूं और आप सभी से भी ऐसा ही करने की आशा करती हूं.

Sunday 5 June 2011

अगुवाई की छवि से बाहर निकलो

शनिवार की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ उसे देखकर तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि बेचारा सत्याग्रह, बेचारा आंदोलन और बेबस जनता। ना मुद्दा रहा, ना आंदोलन और डंडे पड़े सो अलग। और फिर मीडिया तो बाबामय हो ही गया है। मुहिम जाए भाड़ में। वैसे एक बात है भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। हां ऐसा नहीं होना जरूर चमत्कार कहा जा सकता है। इस घटना के बाद अब जरा आप मिस्र और भारत की तुलना कीजिए। भारत जैसा बड़ा विकासशील देश, करोड़ों की जनसंख्या से लदा और प्रगति के पथ पर अग्रसर इस देश के आगे मिस्र तो कहीं भी नहीं ठहरता। लेकिन उस देश में बिना किसी अगुवाई, बिना किसी नेता या बाबा के ऐसी ऐतिहासिक क्रांति हुई कि तहरीर चौक हमेशा के लिए अमर हो गया। तानाशाह सरकार के पांव उखाड़ने के लिए वहां एक साधारण सी लड़की ने मोबाइल पर मैसेज और वीडियो का सहारा लिया। बस फिर क्या था सारी जनता इस मुहिम में जान हथेली पर लेकर जुट गई। अब जरा लौट कर आते हैं भारत की सरजमीं पर। यहां हमें यानि जनता को किसी अन्ना या फिर किसी बाबा की अगुवाई की सख्त जरूरत महसूस होती है। हमारी ये जरूरत सत्ता खूब जानती है तभी तो जनहित में शुरू हुई कोई भी मुहिम राजनीति की कुटिल चालों की आसानी से शिकार हो जाती है। अन्ना हजारे की लोकपाल बिल मुहिम पर कभी सीडी कांड तो कभी सदस्यों के बीच असहमति की गाज गिरती ही रहती है। और फिर बाबा रामदेव का शुरू किया गया आंदोलन महाभारत की युद्धभूमि में बदल गया। मैं पूछती हूं आखिर मिला क्या। काला धन और भ्रष्टाचार मुद्दा तो हवा हो गया और तो और बाबा की जनहित मंशा पर भी सवालिया निशान लग गये हैं। इस सबसे नुकसान सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की मुहिम को हुआ है। बाबा और सरकार के बीच गुपचुप या सार्वजनिक रूप से जो कुछ भी हुआ उसपर हमें और आपको शर्म आनी चाहिए। बाबा की जादुई छवि में भ्रष्टाचार आंदोलन का धुलना हमारी हार ही तो है। सत्ता तो स्वार्थी है ही, फिर बाबा भी अपनी छवि बढ़ाने के फेर में फंसते चले गए। वैसे वक्त अभी भी है। ये हमारी समस्या है। इसके लिए कोई बाबा क्यों अगुवाई करे। क्यों ना हम आप ही मिलकर इसे सफल बनाएं।

Friday 4 February 2011

... यूं ही एक दिन

"...कितनी सुन्दर लगेगी, वैसे भी चंचल का रंग उस लड़की से ज्यादा साफ है। और फिर चंचल यकीनन उससे कई गुना सुंदर है", अचानक आशीष ठिठककर रुक गया "अरे मैं भी पागल ही हूं, क्या अपने आप से बड़बड़ाए जा रहा हूं। फिर मैने उस लड़की को देखा ही कहां। लेकिन जो भी है, सुनील ने बताया तो था कि वो लड़की जरा पक्के रंग की है लेकिन सुंदर है"। हल्की सी मुस्कान होंठों पर तैरने लगी और आशीष सिर झटककर आगे बढ़ गया। आज तो जैसे सारी दुनिया को चीरकर बस किसी तरह जल्द से जल्द घर पहुंचने को आतुर था आशीष। बेसब्र मन पंख लगाकर घर की चौखट पर जा गिरने को है।
हर रोज घर से बस स्टैंड और बस स्टैंड से घर तक के पैदल सफर में आशीष न जाने कितनी बार रास्ते में आने वाली लगभग हर चीज को मनभर गाली देता, कोसता। फिर चाहे वो सड़क के कोने में खड़ी फूस की अवैध झुग्गियां हों, ऊपर तक भरे गंदे नाले हों, प्रशासन की उन्हें हटाने में नाकामी की दास्तां हो, धूल-धुआं या फिर मंजिल तक पहुंचने की होड़ में भागती गाड़ियों का शोर। हर उस साये से नफरत है आशीष को जो इस गंदगी के करीब ले जाए उसे। कभी सरकार की विफलता, तो कभी शराब के ठेके पर धुत शराबियों का दिन भर की ढियाड़ी को जहर के गिलास पर मस्ती से उड़ाना, कभी पानी की बूंद-बूंद के लिए सड़क के बीच मारपीट तो कभी सर्द मौसम में दो चिथड़ों टांगे नंगे पांव साइकिल का टायर घुमाते बच्चे। मुश्किल से पंद्रह मिनट का वो रास्ता आशीष के लिए आधे घंटे में बदल जाता।
"इस इलाके में रहना अच्छा तो नहीं लगता यार लेकिन क्या किया जाए। साली नौकरी की मजबूरी और तंग हाथ सब कुछ कराता है", आशीष अपने दोस्त सुनील से रोज यही कहता।
लेकिन आज... आज बात कुछ और ही है। कुछ सोचकर मन की तरंगें कुलांचे भरने लगीं। पैरों का भारीपन, ऑफिस की थकान और झुग्गी का वो उबाऊ माहौल, कुछ भी तो उसे विचलित नहीं कर पा रहा है। आज उसकी आंखों के सामने प्यारी सी चंचल खड़ी है। सुर्ख गुलाबी सूट में और हां... वही गुलाबी सैंडि़ल भी पहनी है छुटकी ने। वो घूम रही है बार-बार। थोड़ा आगे चलती, थोड़ा पीछे फिर किसी फिल्म की हीरोइन की तरह बलखाकर चाल दिखाती। "... अरे अरे जरा संभलकर। गिर जाओगी" कहकर आशीष ने झट से दोनों हाथ रक्षात्मक मुद्रा में आगे बढ़ा दिए। नजरें इधर-उधर दौड़ाईं तो चंचल ओझल हो चुकी थी।
आशीष शरारती मुस्कान चेहरे पर लिए आगे बढ़ गया। लेकिन ये क्या... घर की तरफ बढ़ते कदम अचानक धीमे क्यों पड़ गए? उमंगों के इस शांत सागर में दूर से चली आ रही इन विरोधाभाषी लहरों का रुख इस ओर क्यों है? "ये मुझे क्या हो रहा है। एक पल पहले तक तो मैं खुशी के सागर में डुबकियां लगा रहा था लेकिन फिर दूसरे ही पल मन उदास सा क्यों होने लगा है" आशीष को कुछ समझ में नहीं आया। उसने सिर नीचे किया फिर उंगलियों को बालों में पीछे की ओर नचाया और बस... उदासी की वजह गुलाब दुपट्टा ओढ़े सामने ही खड़ी थी। जिस अनचाहे डर को बस से उतरकर इतनी देर से भुलाने की कोशिश करता रहा आशीष, वही डर उसके सपनों की रंगीन दुनिया को काला करने की कोशिश में कामयाब हो रहा था।
अभी कुछ देर पहले की ही तो बात है। हर एक सीन उसकी आंखों के आगे नाचने लगा। सुनील के साथ घर वापस लौटते हुए किस्मत से आज बस में एक सीट खाली मिली। धप्पाक से मैं उस सीट पर बैठ गया। आधे घंटे बाद एक तेज झटके ने मेरी नींद तोड़ दी। मेरे चेहरे पर गुस्से और फिर खुशी के मिले जुले भाव उभर आए। गुस्सा नींद टूटने की झुंझलाहट का साक्षी था और खुशी मिली मुझे उस भीनी सी परिचित खुशबू से। गर्दन घुमाकर अपनी बायीं ओर देखा तो ठीक मेरे सामने गुलाबी सूट पहने एक लड़की भीड़ में जगह पाने की जद्दोजेहद में थी। एक बारगी तो मन हुआ कि उठ जाऊं और फिर मैं लेडीज़ सीट पर बैठा था लेकिन रास्ते की दूरी के अहसास ने त्याग की बलवती इच्छा को दबा दिया। उस लड़की का चेहरा तो नहीं देख पाया लेकिन उसी गुलाबी सूट में सजी अपनी छुटकी की कल्पना जरूर की। कब से पीछे पड़ी है "भइया गुलाबी सूट और गुलाबी सैंडिल ला दो ना"। बिल्कुल... इस बार तो छुटकी की इच्छा गुलाबी चुनरी जरूर ओढ़ेगी। आखिर बोनस के पैसों से सबसे पहला काम यही तो करना है। ये सोचकर आशीष की आंखों में चमक आ गई। इसी बीच बस में हलचल के साथ शोर-शराबा बढ़ गया था। कुछ मनचले शायद बहुत देर से गुलाबी सूट वाली लड़की को छेड़ रहे थे। मेरी सीट के पास खड़े सुनील ने मुझे कोहनी मारकर कहा " देख ना आशु, उसका यार भी आ गया है पीछे से। हां भाई... इस जैसी सुंदरी को बचाने नहीं आएगा तो क्या तुझे या मुझे बचाएगा। वैसे बड़ा किस्मत वाला है जो ऐसी पटाखा मिली है, क्या कहते हो"? शोर बढ़ रहा था। देखते ही देखते बात हाथापाई पर उतर आई। भीड़ की वजह से ज्यादा तो कुछ नहीं देख पाया हां लेकिन उन बदमाशों ने लड़की का दुपट्टा खींचकर उसे बस से नीचे धक्का दे दिया। लड़की का दाया हाथ विपरीत दिशा में तेजी से आते एक दुपहिया स्कूटर के नीचे आ गया। लड़की चिल्लाती रही। मैं, सुनील और बस में बैठे सभी यात्री चुप थे। बुत बनकर केवल तमाशा देखा जा रहा था। "ओफ्फ यार... मैं ही अकेला क्या करता। और भी तो लोग थे बस में, सभी चुप थे। और फिर उन सालों का क्या भरोसा। कहीं चाकू-छुरी निकाल लेते तो फालतू में मैं तो जाता ना जान से। और फिर वो लड़की भी कुच वैसी ही लगी। कोई दूध की धूली हुई तो नहीं थी आखिर अपने ब्यॉयफ्रेंड के साथ जो थी। जाने घरवालों से क्या बोलकर निकली थी। छि: क्या जमाना आ गया है"। ऐसी-वैसी ढेर सारी बातें मन में सोचकर उस उमड़ते काले तूफानी साए को आशीष ने शांत करने की भरपूर कोशिश की। आशीष सोच में ही डूबा था कि उसे अहसास हुआ कि उसके कदम घर की चौखट पर आ पहुंचे हैं। उसे थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ क्योंकि घर का दरवाजा अधखुला था। बैग सोफे पर फैंका और टाई ढीली करते हुए चिल्लाया- छुटकी...छुटकी... अंदर से कोई आवाज नहीं आई। आशीष कुछ सोचकर मुस्कुराया। "अच्छा बाबा छुटकी नहीं, तू अब बड़ी हो गई है। नाराज मत हो मैं तुझे तेरे नाम से ही बुलाऊंगा। चंचल अब तो बाहर आ और हां वो कांच के गिलास में ही पानी लाना"।
बहुत देर तक कोई हलचल ना होने पर आशीष का मन किसी आशंका के डर से घबराया। वो उठा और चंचल का कमरा, किचन, अपना कमरा, घर के पीछे छोटा सा बगीचा सभी जगह टटोला। " घर तो खाली है आखिर कहां गई चंचल"। तभी घड़ी ने आठ बजे का घंटा बजाया और चिंता की लकीरें उसकी माथे पर गहरा गईं। शायद जिस तूफान की आशंका उसे सता रही थी वो आ चुका था। आशीष ने खुद को उस तूफान की गिरफ्त में कसता हुआ महसूस किया। अचानक किसी के कदमों की आहट ठंडी पवन का झोंका संग लेकर आई। उसने सिर उठाया तो देखा कि मां सामने खड़ी है। मां के पैरों में दोनों हाथ टिकाककर उसने कहा "पाय लागू मां, अरे आप... कब आईं ? मुझे फोन कर देतीं, मैं स्टेशन पर लेने आ जाता। अच्छा आपने ही छुटकी को कहीं भेजा होगा और मैं कबसे चिंता कर रहा था"। ये सब आशीष ने एक सांस में ही कह डाला जैसे कुछ भी नकारात्मक सुनने से खुद को रोक रहा हो। फिर पलटा और मां के लिए एक गलास ट्रे में रखकर वहीं एक कोने में बोनस समेत अपनी सैलेरी सजा दी।
"आशु बेटा, मैं तो सुबह ही आ गई थी। पड़ोस का संजू ही मुझे स्टेशन पर लेने पहुंच गया था। इस बार छुटकी के लिए उसका मनपसंद गुलाबी सूट और सैंडिल ले ही आई। सोचा क्या करेंगे पैंशन के पैसों का जब छुटकी के असमान भी पूरे ना कर पाए तो। मन पक्का किया और बड़े बाजार से सस्ते सौदे में ले आई। वही पहनकर तो गई है सुषमा को चिढ़ाने। और बेटा अकेली थोड़े ही गई है हमारा गबरू जवान संजू भी तो उसके साथ गया है। जिद करने लगा, मैं भी दीदी के साथ जाऊंगा। मैं उसी के घर से तो आ... "। मां शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि आशीष के हाथों से डगमगाती ट्रे जमीन पर गिर गई। कांच का गिलास छिटटकर कई टुकड़ों की शक्ल में कमरे में फैल गया। उसकी आंखों के सामने अब घुप्प अंधेरा था। लगा कि जैसे कमरे में वो अकेला है। बेसहारा, बेबस। वो प्यारी सी छुटकी की आकृति... गुलाबी सूट में जाने क्यों धीरे धीरे दूर जा रही थी। और सूट की दायीं बाजू में ये लाल रंग कैसा है। और ठीक उसी पल वो शर्मनाक वाकया उसकी आंखों के सामने तैर गया। आशीष चिल्लाया " मैं उसे बचा सकता था। मैं... मैं अगर हिम्मत करता तो चिल्लाकर भीड़ इकठ्ठी कर सकता था। शायद वो गुंडे डर जाते। वो लड़की... वो गुलाबी सूट बच जाता। हे भगवान, उस लड़के ने मेरी छुटकी को बचा लिया हो। शुक्र है कोई तो था छुटकी के साथ"। मां बेहद आश्चर्य से आशीष को निहार रही थी। एक दो बार उसे सम्भालने की नाकाम कोशिश भी की। आशीष से ध्यान हटा तो मां ने ट्रे की तरफ देखा तो सफेद लिफाफा पूरी तरह भीग चुका था और अंदर पड़े नोट भी। मां जल्दी से भीगे नोट बटोरने लगी।
"बहुत देर हो चुकी है मां। कोई फायदा नहीं... कोई फायदा नहीं", बड़बड़ाता हुआ आशीष दरवाजे की तरफ गया और नंगे पांव ही गंदी बस्ती की तरफ दौड़ पड़ा।

Tuesday 14 December 2010

२ जी स्पैक्ट्रम घोटाला फ़ाइल बंद

जी हां ये सच है। मैं ये दावे के साथ कह सकती हूं। ये सूचना उन सभी भारतवासियों के लिए है जो सोच रहे हैं कि २ जी स्पैक्ट्रम घोटाले की छानबीन का कुछ नतीजा निकलेगा या निकलने वाला है। कुछ नहीं होने वाला देश के सबसे शर्मनाक इस घोटाले का। बाकी सभी घोटालों की तरह ये भी सांठगांठ की भेंट चढ़ जाएगा। कोई भी समझदार भारतीय ये बात आसानी से समझ सकता है कि भैंस के आगे बीन बजाने से कुछ नहीं होने वाला। आखिर क्या हुआ भोपाल गैस कांड का, या फिर क्या हुआ रक्षा सौदों से जुड़े तहलका खुलासे का या फिर गोधरा कांड के पीछे छिपे असली दरिंदों का। और फिर भई स्पैक्ट्रम घोटाले में तो खबरों की खबर लेने वाले मीडिया के ही कुछ दिग्गजों के दिमाग भिड़े हुए हैं तो फिर इसका तो कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस शर्मनाक घोटाले में साफ सुथरी छवि रखने वाले हमारे भोले भाले प्रधानमंत्री का नाम भी सीधे-सीधे उछला है। उन्हीं के मंत्रालय की तरफ से लिखी गई चिठ्ठियां सार्वजनिक कर दी गईं हैं। तो फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये रहा कि आखिर जवाब देगा कौन और अपराधियों से जवाब लेगा कौन ? जनता के पैरोकार कुछ मीडियाकर्मी आज खुद सवालों के घेरे में हैं। राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मी और कॉरपोरेट सेक्टर की ये नापाक सांठगांठ एक घिनौने भ्रष्ट समाज की तरफ इशारा करती है। वो समाज जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई सत्ता के केंद्र में बैठे लोग मिलबांट कर मजे से उड़ा रहे हैं। छि: घिन्न आनी चाहिए हर भारतीय को इस गंदी सांठगांठ से। और सभी को मिलकर इन चुंनिंदा गंदी मछलियों को लोकतंत्र की पावन नदी से निकाल कर दूर फैंक देना चाहिए। ताकि ये किनारे पर सड़कर अपनी गति को प्राप्त करें।

Thursday 25 November 2010

मां की याद में


... पहली बार महसूस हुआ कि तकनीक ने दुनिया कितनी बदल दी है। वेंटिलेटर की मदद से पता ही नहीं चलता कि आपके अपने ने कब संसार से विदा ले ली... कब आपको अलविदा कह दिया। वेंटिलेटर में डाली गई दवाओं के प्रभाव से वो अंत तक सांस लेती रहीं... लेती रहीं। मैं देखती रह गई और माजी ने मेरे सामने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सकी। डॉक्टर ने बताया कि वो जा चुकी हैं। मैं सन्न रह गई। वो लम्हा कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके साथ वो मेरी दुनिया भी ले गईं। मुझे बहू से बेटी बनाया उन्होने और अपनी बेटी को छोड़कर चलीं गईं वो। उसके बाद मुझे दुनिया की तमाम उन सच्चाईयों से रूबरू होना पड़ा जिनको देखकर, सुनकर मैं दुखी कम आश्चर्यचकित ज्यादा थी। माजी के जाने के बाद उनकी तेरहवीं के लिए मुझे बिहार अपने ससुराल जाना था। माजी के बिना घर सूना था, बहुत सूना। लेकिन जिस तरह से उनके जाने के तुरंत बाद आस-पड़ोस के लोगों, यहां तक कि अपनों ने जो व्यवहार किया वो बहुत अजीब था। सबकी आंखों में दुख कम एक अजीब सी बेचैनी देखी मैने। इंसान के जाने के बाद रीतिरिवाजों से घिरी दुनिया का आडंबर देखकर मन व्यथित हो उठा। पता नहीं किसने ये रिवाज बनाए जो जिंदा बचे सदस्यों को परेशान कर देते हैं। किसी चीज में मेरा बस नहीं था सो जो सबने कहा मैने किया। खैर, घर की मालकिन के जाने का दुख घर के हर कोने में था। हर खिड़की से झांकता मेरा अतीत मेरे वर्तमान पर हंसता नज़र आया। हर दीवार, हर बर्तन पर माजी की छाप थी। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि माजी हमेशा जिंदा रहेंगी। हमारी यादों में, हमारी बातों में और उस अहसास में जो वो आखिरी वक्त में हमें देकर गईं। वो जहां भी हों, खुश और शांत रहें।

Saturday 9 October 2010

एक रात की बात

... पुतलियां डगमगाई तो देखा कि कालिख पुती वो रात चल बसी। ना जाने और क्या क्या हुआ उस रात। भर रात जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों से पर्दा नुचता गया। हां मैने देखा खुद अपनी आंखों से... मौत से जिंदगी की भीख मांगती सांसों को। उस रात हम अपने मरीज के साथ हर हॉस्पिटल की चौखट पर गए लेकिन बीमार बिलबिलाती भीड़ से अस्पताल पटे पड़े थे। क्या पता था कि रात की चादर में कितने कांटे बिछे हैं। आखिरकार आरएमएल में शरण मिल ही गई। इमरजेंसी का वो दृश्य आज भी आंखों में तैर जाता है। स्ट्रेचर पर अधजली हालत में कुछ ढका, कुछ खुला सांसे लेता वो शरीर, खून से लथपथ वो आदमी, कराहती सिकुड़ी वो बुढ़िया और बदहवास तीमारदार। हमारे सामने वाले स्ट्रेचर पर एक बूढ़ी के हाथ-पैर दबाता उसका हमसफर बार बार ऊंघ रहा था। क्या करे बेचारा रात का वो पहर आमतौर पर नींद में गोते लगाने का ही होता है लेकिन अचानक पत्नी को पैरालाइसिस का अटैक पड़ गया। सो ना जाने कब से अपनी रोती बिलखती पत्नी के अंगों को दबाकर उसे शांत करने की असफल कोशिश में जुटा था। इंजैक्शन और दवाई की बदबू से मन भारी हो गया। सुबह से ही परेशान मन कहीं पलभर बैठने की जगह ढूंढने लगा लेकिन वहां उस माहौल में ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीबवालों को ही मिल रही थी। कई बदकिस्मत ऐसे भी थे जिनको इमरजेंसी में घुसने का मौका तक नहीं मिला। वो लोग बाहर बैठे लाचार तरसती नजरों से जगह खाली होने का इंतजार कर रहे थे। बीमारों को आसरा अस्पताल का और अस्पताल खचाखच भरे हुए। एक अदद स्ट्रेचर की तलाश में तीमारदार लगातार बस भाग रहे थे। गुमसुम घबराए सभी चेहरे एक बूंद आंसू बहाने को वक्त तलाशते दिखे लेकिन मरीज को कुछ हो ना जाए, इसकी चिंता रोने की इजाजत भी नहीं दे रही थी। इस सब के बीच अचानक जोर से चिल्लाने की आवाज आई। और फिर कई आवाजें एक साथ मिल गईं। मैं भागकर उस दिशा में गई तो पांव फर्श पर जम गए। आंखे पथराईं और जीभ बाहर... एक शरीर से सांस टूट चुकी थी। अब तो घबराहट अपने चरम पर थी।
खैर कई घंटों बाद हमारे मरीज को एक वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन चैन को भी चैन ना था उस रात। अभी शिफ्ट हुए ही थे कि धड़धड़ाते हुए तीन डॉक्टर्स वॉर्ड में घुस गए और १५-१६ साल के बच्चे की छाती को दबाकर पंप करने लगे। बच्चे की सांसे लगभग जा चुकी थीं फिर भी डॉक्टर्स की कोशिश लगातार जारी थी। जिंदगी और मौत की ऐसी जंग पहली बार देख रही थी। 10 मिनट तक ये सिलसिला जारी रहा. पंप... पंप... पंप और फिर... सांस लेने की आवाज। आखिरकार बच्चे की सांसे वापस आने लगीं मतलब जिंदगी जंग जीत गई। इस बीच अचानक घड़ी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सुई पांच पर अटकी हुई थी। मैं इमरजेंसी के बाहर निकली। सुबह अंगड़ाई ले रही थी। अपनी चिर परिचित खुशबू के साथ अलसाए संसार में जान फूंक रही थी। लंबी लंबी सांसें भरने के बाद मैं दोबारा इमरजेंसी के अंदर गई तो लगा कि नजारा बदल चुका है। धीरे धीरे वहां शांति ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। फर्शों की सफाई हो रही थी, कई मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका था। जिनके अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया था वो भी रात भर रोकर अब आगे की कार्रवाई को शांति से निपटाने में व्यस्त थे। लगा कि इस सुबह का कितनी देर से इंतजार था मुझे। शांत, शीतल और सात्विक.

Sunday 12 September 2010

... और खोज जारी है

तन्हाई के इस पार, उस पार
झांकू मैं आखिर कितनी बार
मालूम है कि आंचल फैलाए
खड़ी है तू इंतजार में
रास्ता छोटा पर दूरी बड़ी है
मन से बाहर, व्याकुल मन से बाहर
आता नहीं क्यों वो
खुद बाहर आता नहीं
ना आने देता भीतर तुझे
जम गया अवसाद है शायद
रिस रिस कर टपकता है शायद
शांति, संतुष्टि या निजता के पलों को
तन्हाई के तरन्नुम में खोजता मन
खुशियों के पलों में दुख को
खोदता, टटोलता अंशात मन
वो कुछ जो ना मिल सका

उस कुछ की खोज में
नित नई खोज पर निकला
तन्हा, बावरा मेरा मन