क्या वाकई हम बहू-बेटी के दर्जे को समझने या सम्मान करने वाला समाज हैं? ये सवाल मेरा हर उस भारतीय से है जो उस देश में रहता है जिसे दुनिया का गुरू कहा जाता है। २०० साल गुलामी की बेड़ियों में लिपटी भारत मां को इसके सपूतों ने प्राणों की आहूति देकर स्वतंत्र कराया। लेकिन ये सब किसलिए? क्या इसलिए कि एक बार फिर यहां औरतों को परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर गुलाम बनाकर गुड़िया की तरह घर में सजा दिया जाए। अगर नहीं तो कानपुर के कॉलेजों में लड़कियों के जींस पहनने का तुगलकी फरमान किस तरफ इशारा करता है। आखिर क्या खराबी है इस पहनावे में। मैं पूछती हूं कपड़ों का उद्देश्य क्या होता है; तन को ढकना। फिर चाहे वो किसी भी तरीके से ढका जाए। दरअसल इस विचारधारा की जड़ को खोदा जाए तो मिलेगा कि इस समाज में लड़कियों को हमेशा रक्षात्मक स्तर पर रखा गया है। हमेशा उन्हें असमाजिक तत्वों का डर दिखाकर घर की कोठरी में बंद रहने की सलाह दी गई। आखिर क्यों- सवाल ये है कि क्या सलवार कमीज पहनी (जो कि इस समाज में एक सलीकेदार पहनावे के रूप में देखा जाता है) किसी राह चलती लड़की को गंदे और अश्लील कमेंट सुनने को नहीं मिलते या फिर सरेआम उठाकर उसकी आबरू को तार तार नहीं किया जाता ? फिर यहां पहनावे की भूमिका ही कहां रही ? ये पहनावा या ऐसी ही तमाम वो बंदिशें वास्तव में उस कमजोर समाज की नाकामी को बयां करती है जो अपने घर में ही बहू-बेटियों को बेइज्जत होने से बचा पाने में लाचार है। और अगर कपड़ों से ही मानसिक विकार को रोका जा सकता है तो फिर लडकों को भी धोती कुर्ता पहनकर सड़क पर निकलना चाहिए ताकि उनकी तामसिक और आपराधिक भावनाओं को काबू किया जा सके। रोकना है तो असमाजिक रूढ़िवादी सोच को रोकिए, रक्षात्मक घेरे में आपकी बेटियां कभी भी समाज में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों को मुंहतोड़ जवाब नहीं दे सकतीं। सिखाना है तो उन्हें गलत के खिलाफ लड़ना सिखाइए। उन्हें सिर उठाकर जीना सिखाइए ताकि ये संभावना बनी रहे कि वो मुश्किल वक्त में आत्मरक्षा कर सके। और बलात्कार का दंश झेल रही लड़की अपनी आत्मा को पवित्र समझकर नए सिरे से जिंदगी शुरू कर सके। बहू-बेटी घर की लज्जा तब है जब आप उनके अधिकारों को सौंपकर उन्हें खुद फैसला लेने की छूट दें। आक्रमणकारी बीमार तो ये समाज है और इस संक्रामित समाज की त्रासदी लड़कियां झेल रही हैं। और आखिर में कहना चाहती हूं कि नियम कानून समाज को सही दिशा-दशा देने के लिए होते हैं ताकि जीवन खुशहाल हो सके। किसी भी कानून से जीवन बेहाल तो कतई नहीं होना चाहिए।
Friday, July 10, 2009
...क्योंकि ठहरा हुआ पानी सड़ने लगता है
इसलिए इस समाज को बदलने की सख्त जरूरत है
क्या वाकई हम बहू-बेटी के दर्जे को समझने या सम्मान करने वाला समाज हैं? ये सवाल मेरा हर उस भारतीय से है जो उस देश में रहता है जिसे दुनिया का गुरू कहा जाता है। २०० साल गुलामी की बेड़ियों में लिपटी भारत मां को इसके सपूतों ने प्राणों की आहूति देकर स्वतंत्र कराया। लेकिन ये सब किसलिए? क्या इसलिए कि एक बार फिर यहां औरतों को परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर गुलाम बनाकर गुड़िया की तरह घर में सजा दिया जाए। अगर नहीं तो कानपुर के कॉलेजों में लड़कियों के जींस पहनने का तुगलकी फरमान किस तरफ इशारा करता है। आखिर क्या खराबी है इस पहनावे में। मैं पूछती हूं कपड़ों का उद्देश्य क्या होता है; तन को ढकना। फिर चाहे वो किसी भी तरीके से ढका जाए। दरअसल इस विचारधारा की जड़ को खोदा जाए तो मिलेगा कि इस समाज में लड़कियों को हमेशा रक्षात्मक स्तर पर रखा गया है। हमेशा उन्हें असमाजिक तत्वों का डर दिखाकर घर की कोठरी में बंद रहने की सलाह दी गई। आखिर क्यों- सवाल ये है कि क्या सलवार कमीज पहनी (जो कि इस समाज में एक सलीकेदार पहनावे के रूप में देखा जाता है) किसी राह चलती लड़की को गंदे और अश्लील कमेंट सुनने को नहीं मिलते या फिर सरेआम उठाकर उसकी आबरू को तार तार नहीं किया जाता ? फिर यहां पहनावे की भूमिका ही कहां रही ? ये पहनावा या ऐसी ही तमाम वो बंदिशें वास्तव में उस कमजोर समाज की नाकामी को बयां करती है जो अपने घर में ही बहू-बेटियों को बेइज्जत होने से बचा पाने में लाचार है। और अगर कपड़ों से ही मानसिक विकार को रोका जा सकता है तो फिर लडकों को भी धोती कुर्ता पहनकर सड़क पर निकलना चाहिए ताकि उनकी तामसिक और आपराधिक भावनाओं को काबू किया जा सके। रोकना है तो असमाजिक रूढ़िवादी सोच को रोकिए, रक्षात्मक घेरे में आपकी बेटियां कभी भी समाज में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों को मुंहतोड़ जवाब नहीं दे सकतीं। सिखाना है तो उन्हें गलत के खिलाफ लड़ना सिखाइए। उन्हें सिर उठाकर जीना सिखाइए ताकि ये संभावना बनी रहे कि वो मुश्किल वक्त में आत्मरक्षा कर सके। और बलात्कार का दंश झेल रही लड़की अपनी आत्मा को पवित्र समझकर नए सिरे से जिंदगी शुरू कर सके। बहू-बेटी घर की लज्जा तब है जब आप उनके अधिकारों को सौंपकर उन्हें खुद फैसला लेने की छूट दें। आक्रमणकारी बीमार तो ये समाज है और इस संक्रामित समाज की त्रासदी लड़कियां झेल रही हैं। और आखिर में कहना चाहती हूं कि नियम कानून समाज को सही दिशा-दशा देने के लिए होते हैं ताकि जीवन खुशहाल हो सके। किसी भी कानून से जीवन बेहाल तो कतई नहीं होना चाहिए।
क्या वाकई हम बहू-बेटी के दर्जे को समझने या सम्मान करने वाला समाज हैं? ये सवाल मेरा हर उस भारतीय से है जो उस देश में रहता है जिसे दुनिया का गुरू कहा जाता है। २०० साल गुलामी की बेड़ियों में लिपटी भारत मां को इसके सपूतों ने प्राणों की आहूति देकर स्वतंत्र कराया। लेकिन ये सब किसलिए? क्या इसलिए कि एक बार फिर यहां औरतों को परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर गुलाम बनाकर गुड़िया की तरह घर में सजा दिया जाए। अगर नहीं तो कानपुर के कॉलेजों में लड़कियों के जींस पहनने का तुगलकी फरमान किस तरफ इशारा करता है। आखिर क्या खराबी है इस पहनावे में। मैं पूछती हूं कपड़ों का उद्देश्य क्या होता है; तन को ढकना। फिर चाहे वो किसी भी तरीके से ढका जाए। दरअसल इस विचारधारा की जड़ को खोदा जाए तो मिलेगा कि इस समाज में लड़कियों को हमेशा रक्षात्मक स्तर पर रखा गया है। हमेशा उन्हें असमाजिक तत्वों का डर दिखाकर घर की कोठरी में बंद रहने की सलाह दी गई। आखिर क्यों- सवाल ये है कि क्या सलवार कमीज पहनी (जो कि इस समाज में एक सलीकेदार पहनावे के रूप में देखा जाता है) किसी राह चलती लड़की को गंदे और अश्लील कमेंट सुनने को नहीं मिलते या फिर सरेआम उठाकर उसकी आबरू को तार तार नहीं किया जाता ? फिर यहां पहनावे की भूमिका ही कहां रही ? ये पहनावा या ऐसी ही तमाम वो बंदिशें वास्तव में उस कमजोर समाज की नाकामी को बयां करती है जो अपने घर में ही बहू-बेटियों को बेइज्जत होने से बचा पाने में लाचार है। और अगर कपड़ों से ही मानसिक विकार को रोका जा सकता है तो फिर लडकों को भी धोती कुर्ता पहनकर सड़क पर निकलना चाहिए ताकि उनकी तामसिक और आपराधिक भावनाओं को काबू किया जा सके। रोकना है तो असमाजिक रूढ़िवादी सोच को रोकिए, रक्षात्मक घेरे में आपकी बेटियां कभी भी समाज में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों को मुंहतोड़ जवाब नहीं दे सकतीं। सिखाना है तो उन्हें गलत के खिलाफ लड़ना सिखाइए। उन्हें सिर उठाकर जीना सिखाइए ताकि ये संभावना बनी रहे कि वो मुश्किल वक्त में आत्मरक्षा कर सके। और बलात्कार का दंश झेल रही लड़की अपनी आत्मा को पवित्र समझकर नए सिरे से जिंदगी शुरू कर सके। बहू-बेटी घर की लज्जा तब है जब आप उनके अधिकारों को सौंपकर उन्हें खुद फैसला लेने की छूट दें। आक्रमणकारी बीमार तो ये समाज है और इस संक्रामित समाज की त्रासदी लड़कियां झेल रही हैं। और आखिर में कहना चाहती हूं कि नियम कानून समाज को सही दिशा-दशा देने के लिए होते हैं ताकि जीवन खुशहाल हो सके। किसी भी कानून से जीवन बेहाल तो कतई नहीं होना चाहिए।
Thursday, July 9, 2009
उफ ये सीरियल्स....
"दीदी ये रखैल क्या होता है", टीवी पर नजरें गढ़ाए मेरे भतीजे ने मुझ पर ये सवाल दागा तो महसूस हुआ कि सात साल के बच्चे को इस शब्द की गूढ़ता समझाना कितना मुश्किल है... टीवी से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की ये महज एक बानगी भर है...
दृश्य-श्रव्य गुणों के कारण टीवी एक ऐसा माध्यम है जिसे परिवार का हर सदस्य एक साथ बैठकर देख सकता है। टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम और फिल्में ना सिर्फ मनोरंजन का बेहतर जरिया है बल्कि दर्शक इनसे जुड़ाव भी साफ महसूस करते हैं। यही जुड़ाव छोटे परदे के धारावाहिकों के माध्यम से काल्पनिक, वास्तविक, सामाजिक और मानसिक सभी सतहों को छूता हुआ सीधा उनकी निजी जिंदगी में प्रवेश कर जाता है। बड़े परदे के दर्जे का मान-सम्मान और बुलंदियां छूने की चाहत में धारावाहिकों को अपने कन्वेंशल रोल से बाहर निकलना पड़ा। 'हम लोग' से शुरू हुआ ये लंबा सफ़र 'नया नुक्कड़ ' से गुजरता हुआ 'लिप्स्टिक' और अंतहीन सास-बहू-बेटियों के पैंतरों में फंसकर रह गया है।
घर-घर में आम सास-बहू की नोंक-झोंक को भारतीय संस्कृति परंपरा से जोड़कर प्रसिद्धि पाने की कोशिश बेहद सफल रही लेकिन अति किसी भी विचारधारा के पतन का पहला कारण है। वास्तविकता दिखाते-दिखाते काल्पनिकता की सारी हदें पार कर जाना भी कहां की समझदारी है। धारावाहिकों में कहीं आलीशान दरो-दरवाजा है तो कहीं मानवीय भावनाओं का भरपूर मखौल उड़ाते हुए मुख्य पात्र को मुसीबतों से हर पल जूझते हुए दिखाया जाता है। छोटे पर्दे की तरह वास्तव में ना तो जीवन इतना आसान और आलीशान है औऱ ना ही मुसीबतों से सराबोर। धारावाहिकों का ये अंधा भटकाव टीआरपी रेटिंग की अंधाधुंध भेड़चाल का ही नतीजा है। अश्लील दृश्य, द्विअर्थी भाषा, गंदे संवाद और प्रेमसंबंधों को भुनाने की कवायद भी इसी कोशिश का घिनौना रूप है। 'चंद्रकांता' जैसा भव्य और प्रसिद्ध धारावाहिक अपनी अश्लीलता के कारण ही बंद हुआ।
दरअसल ये भाषा या बनते-बिगड़ते ये रिश्ते समाज में इतने आम नहीं हैं जितना इन्हें दिखाने की जी-तोड़ कोशिश की जाती है। इसलिए समाज का आइना कहलाने वाला छोटा परदा समाज का वास्तविक स्वरूप दिखाने में नाकामयाब साबित हो रहा है। हां, भारतीय समाज यकीनन बदल रहा है लेकिन यहां मानसिक परिवर्तन की दर भौतिक परिवर्तन से बहुत धीमी है। लोगों की सोच, विचारधारा और जरूरतों से भी तेज छोटे परदे की दुनिया भाग रही है। बार-बार कथित उन्मुक्त समाज की बेलगाम छवि बच्चों को परोसने की वजह से बच्चे इन्हें जीवन से जुड़ी एख सामान्य घटना समझकर गलत संबंधों की तरफ आकर्षित होते हैं लेकिन नतीजा सिफ़र निकलने पर आत्महत्या जैसा चरम कदम उठाने से भी नहीं चूकते।
इस सब के साथ ही नारी की एक बेहद काल्पनिक छवि भी दर्शकों को देखने को मिल रही है। औरत, शांति, अर्धांगिनी जैसे नारी प्रधान धारावाहिकों के बाद तो जैसे भारतीय नारी की कथित आधुनिक छवि को उकेरने की होड़ लग गई। आज नारी या तो सोच से परे की खलनायिका है या फिर अत्याधुनिक सहनशीलता की देवी। या तो तंग कपड़ों में अंग प्रदर्शन करती उन्मुक्त विचारों वाली बाला है या फिर लाज शरम की साड़ी में बेकार रूढ़ियों को बेकार में सहती बेचारी अबला। मतलब साफ है काला या सफेद, किसी भी रूप में नारी की आधुनिक छवि, गढ़ी गई लेखनी का खिलौना बन कर रह गई है। हालांकि तुलसी, पार्वती और कुमकुम के सामने जस्सी और करीना जैसे वास्तविक मिडिल क्लास पात्र मुख्य चुनौती बनकर उभरे तो थे लेकिन फिर ये भी आम हो गया।
दृश्य-श्रव्य गुणों के कारण टीवी एक ऐसा माध्यम है जिसे परिवार का हर सदस्य एक साथ बैठकर देख सकता है। टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम और फिल्में ना सिर्फ मनोरंजन का बेहतर जरिया है बल्कि दर्शक इनसे जुड़ाव भी साफ महसूस करते हैं। यही जुड़ाव छोटे परदे के धारावाहिकों के माध्यम से काल्पनिक, वास्तविक, सामाजिक और मानसिक सभी सतहों को छूता हुआ सीधा उनकी निजी जिंदगी में प्रवेश कर जाता है। बड़े परदे के दर्जे का मान-सम्मान और बुलंदियां छूने की चाहत में धारावाहिकों को अपने कन्वेंशल रोल से बाहर निकलना पड़ा। 'हम लोग' से शुरू हुआ ये लंबा सफ़र 'नया नुक्कड़ ' से गुजरता हुआ 'लिप्स्टिक' और अंतहीन सास-बहू-बेटियों के पैंतरों में फंसकर रह गया है।
घर-घर में आम सास-बहू की नोंक-झोंक को भारतीय संस्कृति परंपरा से जोड़कर प्रसिद्धि पाने की कोशिश बेहद सफल रही लेकिन अति किसी भी विचारधारा के पतन का पहला कारण है। वास्तविकता दिखाते-दिखाते काल्पनिकता की सारी हदें पार कर जाना भी कहां की समझदारी है। धारावाहिकों में कहीं आलीशान दरो-दरवाजा है तो कहीं मानवीय भावनाओं का भरपूर मखौल उड़ाते हुए मुख्य पात्र को मुसीबतों से हर पल जूझते हुए दिखाया जाता है। छोटे पर्दे की तरह वास्तव में ना तो जीवन इतना आसान और आलीशान है औऱ ना ही मुसीबतों से सराबोर। धारावाहिकों का ये अंधा भटकाव टीआरपी रेटिंग की अंधाधुंध भेड़चाल का ही नतीजा है। अश्लील दृश्य, द्विअर्थी भाषा, गंदे संवाद और प्रेमसंबंधों को भुनाने की कवायद भी इसी कोशिश का घिनौना रूप है। 'चंद्रकांता' जैसा भव्य और प्रसिद्ध धारावाहिक अपनी अश्लीलता के कारण ही बंद हुआ।
दरअसल ये भाषा या बनते-बिगड़ते ये रिश्ते समाज में इतने आम नहीं हैं जितना इन्हें दिखाने की जी-तोड़ कोशिश की जाती है। इसलिए समाज का आइना कहलाने वाला छोटा परदा समाज का वास्तविक स्वरूप दिखाने में नाकामयाब साबित हो रहा है। हां, भारतीय समाज यकीनन बदल रहा है लेकिन यहां मानसिक परिवर्तन की दर भौतिक परिवर्तन से बहुत धीमी है। लोगों की सोच, विचारधारा और जरूरतों से भी तेज छोटे परदे की दुनिया भाग रही है। बार-बार कथित उन्मुक्त समाज की बेलगाम छवि बच्चों को परोसने की वजह से बच्चे इन्हें जीवन से जुड़ी एख सामान्य घटना समझकर गलत संबंधों की तरफ आकर्षित होते हैं लेकिन नतीजा सिफ़र निकलने पर आत्महत्या जैसा चरम कदम उठाने से भी नहीं चूकते।
इस सब के साथ ही नारी की एक बेहद काल्पनिक छवि भी दर्शकों को देखने को मिल रही है। औरत, शांति, अर्धांगिनी जैसे नारी प्रधान धारावाहिकों के बाद तो जैसे भारतीय नारी की कथित आधुनिक छवि को उकेरने की होड़ लग गई। आज नारी या तो सोच से परे की खलनायिका है या फिर अत्याधुनिक सहनशीलता की देवी। या तो तंग कपड़ों में अंग प्रदर्शन करती उन्मुक्त विचारों वाली बाला है या फिर लाज शरम की साड़ी में बेकार रूढ़ियों को बेकार में सहती बेचारी अबला। मतलब साफ है काला या सफेद, किसी भी रूप में नारी की आधुनिक छवि, गढ़ी गई लेखनी का खिलौना बन कर रह गई है। हालांकि तुलसी, पार्वती और कुमकुम के सामने जस्सी और करीना जैसे वास्तविक मिडिल क्लास पात्र मुख्य चुनौती बनकर उभरे तो थे लेकिन फिर ये भी आम हो गया।
Wednesday, July 8, 2009
प्रकृति
प्रकृति को स्त्री का मानवीकृत रूप मानकर सभी पहरों का बचपन से लेकर यौवन तक की कहानी
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फूटे नवल किरण, कर प्रणय आगाज
दिशा-दिशा गुंजित कर छेड़े साज
केसरिया चुनर ओढ़े स्वर्णिम ललाट नार
शरमाती, लहराती कुमकुम संग करे श्रृंगार
बलखाकर छेड़े मृदु सुरों के तार
अगणित रंगों संग सृष्टि सजाती
नैनों से हृदय तक आती
चीर पाषाण, पावन नीर बहाती
मदमस्त पवन अंग-अंग लिपटाती
चटककर कली, कुसुम बन जाती
तेरा अस्तित्व मात्र जीवन आधार
मुख तेज से उज्जवलित संसार
काल चक्र गतिमत करता तेरा आकार
चमकीली धूप आंचल की तेरे
जीवन से लेती साक्षात्कार
रजनी को दुर्लभ रत्न चढ़ाकर
आमंत्रित करती चंद्र बुलाकर
दूर छिपा उसे तके प्रभाकर
कजरारे नैनों से कर निष्क्रिय
जीवट करती, फिर भोर खिलाकर
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फूटे नवल किरण, कर प्रणय आगाज
दिशा-दिशा गुंजित कर छेड़े साज
केसरिया चुनर ओढ़े स्वर्णिम ललाट नार
शरमाती, लहराती कुमकुम संग करे श्रृंगार
बलखाकर छेड़े मृदु सुरों के तार
अगणित रंगों संग सृष्टि सजाती
नैनों से हृदय तक आती
चीर पाषाण, पावन नीर बहाती
मदमस्त पवन अंग-अंग लिपटाती
चटककर कली, कुसुम बन जाती
तेरा अस्तित्व मात्र जीवन आधार
मुख तेज से उज्जवलित संसार
काल चक्र गतिमत करता तेरा आकार
चमकीली धूप आंचल की तेरे
जीवन से लेती साक्षात्कार
रजनी को दुर्लभ रत्न चढ़ाकर
आमंत्रित करती चंद्र बुलाकर
दूर छिपा उसे तके प्रभाकर
कजरारे नैनों से कर निष्क्रिय
जीवट करती, फिर भोर खिलाकर
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Wednesday, March 4, 2009
फुहार
आपने कुछ सुना... रुकिए... देखिए और महसूस कीजिए... पहली फुहार... टप-टप बरसती बूंदें और नहा गई सृष्टि। बादलों का राग सुनिए, बूंदों का साज सुनिए, हवा की सनसन सुनिए और सुनिए पंछियों का शोर।
भागती-दौड़ती जिंदगी में फुरसत के दो पल बटोरकर मासूम भीगी प्रकृति को कभी मन की आंखों से छूकर देखा है आपने। बड़े-बड़े कांच के शीशों से बस एक बार हाथ बाहर निकालकर बादलों की गोद से टूटकर बिखरी इन बूंदों को छुआ है आपने... जरूर सोचेंगे आप कि जिंदगी में इतना वक्त ही किसके पास है। लेकिन यकीन मानिए प्रकृति के करीब जाकर आप खुद के नजदीक पहुंच जाते हैं। कल भी, आज भी और कभी ना खत्म होने वाली प्रकृति का ये जादू आपकी परेशानियों को हल्का करके ताकत रखता है। साज, संस्कृति और संगीत के धनी इस देश में अगर आप निश्छल, मीठा और रागों से छलकता संगीत सुनना चाहते हैं तो जाइए... प्रकृति से जाकर मिलिए... उसका साक्षात्कार करिए, तभी आप आध्यात्म के चरम को भी छू सकते हैं। प्राकृतिक संगीत में नवजात की किलकारी के सुर भी हैं तो मां की ममता का ताल भी। विचलित, दुखी और परेशान मन एफएम के धमधम बजते शोर शोर में खोकर जिन सवालों के जवाब ढूंढता है वो सभी प्रकृति की गोद में आकर शांत हो जाते हैं।
बस एक बार, एक कोशिश और आप पल भर के लिए ही सही सभी दुखों से उठकर शान्ति पाने में सफल हो सकेंगे।
भागती-दौड़ती जिंदगी में फुरसत के दो पल बटोरकर मासूम भीगी प्रकृति को कभी मन की आंखों से छूकर देखा है आपने। बड़े-बड़े कांच के शीशों से बस एक बार हाथ बाहर निकालकर बादलों की गोद से टूटकर बिखरी इन बूंदों को छुआ है आपने... जरूर सोचेंगे आप कि जिंदगी में इतना वक्त ही किसके पास है। लेकिन यकीन मानिए प्रकृति के करीब जाकर आप खुद के नजदीक पहुंच जाते हैं। कल भी, आज भी और कभी ना खत्म होने वाली प्रकृति का ये जादू आपकी परेशानियों को हल्का करके ताकत रखता है। साज, संस्कृति और संगीत के धनी इस देश में अगर आप निश्छल, मीठा और रागों से छलकता संगीत सुनना चाहते हैं तो जाइए... प्रकृति से जाकर मिलिए... उसका साक्षात्कार करिए, तभी आप आध्यात्म के चरम को भी छू सकते हैं। प्राकृतिक संगीत में नवजात की किलकारी के सुर भी हैं तो मां की ममता का ताल भी। विचलित, दुखी और परेशान मन एफएम के धमधम बजते शोर शोर में खोकर जिन सवालों के जवाब ढूंढता है वो सभी प्रकृति की गोद में आकर शांत हो जाते हैं।
बस एक बार, एक कोशिश और आप पल भर के लिए ही सही सभी दुखों से उठकर शान्ति पाने में सफल हो सकेंगे।
Sunday, July 20, 2008
कैसे रोकेंगे इस बयार को ?
बताइये कैसे- अरे जनाब मैं कहती हूं नामुमकिन है। अजी भारत ग्लोबल जो हो गया है। ग्लोबल नहीं समझे आप तो स्विच ऑन टु युअर टीवी। फिर देखिए हमारे सास बहू सीरियल हमारे द्विभाषी विज्ञापन या फिर हमीरी फिल्में। सभी में एक ही समानता है- खुलापन। फिर चाहे वो विचारों का हो या तन से सरकते कपड़ों का। परिवार में दरकते रिश्तों का हो या फिर शादी की बदलती मान्यताओं का। ये बयार है पश्चिमी बयार। अपने कई रुपों में और कई आयामों के साथ ये बयार दबे पांव भारतीय संस्कृति में घुलमिल गई है। ये भारतीय संस्कृति में भाषा में तकनीक में, परिवेश में, खानपान में और राजनीतिक विचारधारा में रच बस गई है। खुलेपन की इस बयार में तो वाममोर्चे वाली पश्चिमी बंगाल सरकार भी झूल रही है। राज्य को बदलते सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक परिवेश में पटरी पर दौड़ने की खीझ सरकारी नुमाइंदों में साफ जाहिर है। बस मच गया संग्राम और खून से नहा गया नंदीग्राम। साफ है गुड़ खाएंगे तो गुलगुले से परहेज। हिन्दी में धड़ल्ले से दिखता और बिकता अपराध और सेक्स भी बदलती सामाजिक मान्यताओं और परिवेश को ही इंगित कर रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली में पति पत्नी के पास जब बच्चों के लिए मुश्किल से सिर्फ आधा घंटा ही बच पाता है। तो बच्चों की कल्पनाशीलता को टीवी, वीडियो गेम्स और कम्प्यूटर के पंख लग ही जाते हैं। ये फड़फड़ाते पंख उन्हें दुनिया की अंतहीन खिड़की को तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। बच्चे और युवा खुश हैं, स्वतंत्रता की इस उड़ान से। नसीहतों और आदर्शों की बेड़ियां उन्हें बांधे इससे पहले वो सबकुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। बाहर की इ बयार का स्वागत तो खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी अपने शब्दों में व्यक्त किया था। दरअसल हमारी संस्कृति की विविधता ही इस पश्चिमी बयार को खुद में घुलने मिलने का निमंत्रण देती है। और फिर समय का लगातार घूमता पहिया विकास की पटरी पर दौड़ने के लिए संस्कृतियो के घालमेल की इजाजत देता है। जब खुला विदेशी निवेश समय की मांग है तो इस विशालकाय उपभोक्ता वाले देश में विदेशी संस्कृति भी दबे पांव चुपचाप चली आई। अब सवाल है कि इस बयार को आंधी बनने से कैसे रोका जाए। मैं कहती हूं कि इसे बहने दीजिए बस आप इसके लिए तैयार रहें। थोड़ा समय निकालकर नई पीढी को नसीहतों से भरा बस्ता लादने के बजाए हम बस अपनी संस्कृति और परिवेश की जानकारी उनके सामने रख दो। फिर ये खुद उन्हें फैसला करने दें कि क्या सही है और क्या गलत। तभी वो घालमेल की इस खिचड़ी संस्कृति से निकलकर अपने लिए नए और मजबूत आयाम ढूंढ पाएंगे।
जब हॉकी मेट क्रिकेट

कन ऑन ब्यॉज... वक अप... वक अप... कैच इट... गुड थ्रो... अरे अरे धप्पाक। ओह डोन्ट यू हैव आइज देहाती गंवार। हू आर यू…? \
माफ करना भैया... नमस्कार, हम हॉकी हैं।
ओह तो तुम हो वो झुके डंडे वाला एक फेल गेम। कहो क्या हाल चाल है। लेकिन पहले ये बताओ इस आलीशान क्रिकेट स्टेडियम में ये धोती कुर्ता पहने तुम कहां घुसे आ रहे हो? तुम्हें गार्ड्स ने रोका नहीं? अरे भैया नाराज क्यों होते हो, वो क्या है ना कि हम बड़ी मुश्किल से नजर बचाकर यहां तक पहुंचे हैं। हम देखना चाहते थे कि मेरा हिन्दुस्तान जिस क्रिकेट के पीछे पगलाया जा रहा है आखिर उस बला में ऐसा क्या खास है जो राष्ट्रीय खेल होते हुए भी मुझ में नहीं है।
ओह तो तुम देखना चाहते हो कि खेलों में मैं(क्रिकेट) नंबर एक की गद्दी पर कैसे पहुंचा। वैरी सिंपल मेरे पास आज पैसा है मीडिया है... सरकार है नेता हैं.. अभिनेता हैं और वो अब तो अमेरिका से इंपोर्टेड बारह गोरी छोरियां भी हैं। और तुम्हारे पास क्या है—हांय...
मेरे पास... मेरे पास ... वो.. वो.. हां मेरे पास खेल है जज्बा है।
अरे जाओ बड़े आए..जज्बा वाले। ये जज्बा जरूर सेंटियागो की हरी घास पर फिसल गया होगा जहां से तुम्हारे लड़के अस्सी सालों में पहली बार सिर झुकाए वापस लौटे थे। अरे ओलंपिक बिरादरी में देश की नाक ही कटवा दी तुमने। वैसे भी सिर्फ खेल और सो कॉल्ड जज्बे से नाम और पैसा नहीं कमाया जा सकता। मैं क्रिकेट हूं, तुमने मेरा ये कोट देखा है... स्पेशल अमेरिका से मंगवाया है और इसकी मैचिंग पैंट वो मशहूर डिजाइनर सव्यसाची से सिलवाई गई है। मेरे लड़कों को फैशन शो में रैंप पर इठलाते हुए तो देखा ही होगा तुमने। ऑफ्टर ऑल इट्स जैन्टलमैन्स गेम।
वो सब तो ठीक है भाई... लेकिन जब तुम्हारे लड़के मैदान में मां बहन की गाली दूसरे देश के खिलाड़ियों को देते हैं तब तुम्हारा ये जैन्टलमैन्स गेम किस मुंह से सिर उठाता है। ओह वो तो ... वो तो आक्रामक क्रिकेट की एक बानगी भर है। सुना नहीं तुमने क्रिकेट अब आक्रामक खेल हो गया है। मेरे लड़के मैदान में गालियां और मारपीट नहीं करेंगे तो मीडिया की कवरेज कैसे मिलेगी। वैसे भी ये देश की शान का मामला है। अरे वाह भाई,अपने ही देश के तीसमार खानों को भुलाकर विदेशी कोच के हाथ पैर पकड़कर उसे बुलाना और अपने ही लड़कों की सरेआम बोली लगाने से देश की शान पर बट्टा नहीं लगता क्या? उफ्फ रहोगे ना तुम गंवार के गंवार। इट्स ए पार्ट ऑफ स्ट्रैटजी यार। विदेशी कोच को यहां खेल की चाही अनचाही नीतियों से दबाना जरा आसान होता है। और रही बात लड़कों को बेचने की तो इससे क्रिकेट ग्लोबल होता है। और ठीक ही कहा तुमने, हम करें भी तो क्या करें? हॉकी का बड़े से बड़ा मुकाबला जीतने पर भी मेरे लड़कों पर ना तो पैसे की बरसात ही होती है और ना ही मीडिया से उधारी की पहचान ही मिल पाती है। अच्छा राम- राम चलते हैं।
माफ करना भैया... नमस्कार, हम हॉकी हैं।
ओह तो तुम हो वो झुके डंडे वाला एक फेल गेम। कहो क्या हाल चाल है। लेकिन पहले ये बताओ इस आलीशान क्रिकेट स्टेडियम में ये धोती कुर्ता पहने तुम कहां घुसे आ रहे हो? तुम्हें गार्ड्स ने रोका नहीं? अरे भैया नाराज क्यों होते हो, वो क्या है ना कि हम बड़ी मुश्किल से नजर बचाकर यहां तक पहुंचे हैं। हम देखना चाहते थे कि मेरा हिन्दुस्तान जिस क्रिकेट के पीछे पगलाया जा रहा है आखिर उस बला में ऐसा क्या खास है जो राष्ट्रीय खेल होते हुए भी मुझ में नहीं है।
ओह तो तुम देखना चाहते हो कि खेलों में मैं(क्रिकेट) नंबर एक की गद्दी पर कैसे पहुंचा। वैरी सिंपल मेरे पास आज पैसा है मीडिया है... सरकार है नेता हैं.. अभिनेता हैं और वो अब तो अमेरिका से इंपोर्टेड बारह गोरी छोरियां भी हैं। और तुम्हारे पास क्या है—हांय...
मेरे पास... मेरे पास ... वो.. वो.. हां मेरे पास खेल है जज्बा है।
अरे जाओ बड़े आए..जज्बा वाले। ये जज्बा जरूर सेंटियागो की हरी घास पर फिसल गया होगा जहां से तुम्हारे लड़के अस्सी सालों में पहली बार सिर झुकाए वापस लौटे थे। अरे ओलंपिक बिरादरी में देश की नाक ही कटवा दी तुमने। वैसे भी सिर्फ खेल और सो कॉल्ड जज्बे से नाम और पैसा नहीं कमाया जा सकता। मैं क्रिकेट हूं, तुमने मेरा ये कोट देखा है... स्पेशल अमेरिका से मंगवाया है और इसकी मैचिंग पैंट वो मशहूर डिजाइनर सव्यसाची से सिलवाई गई है। मेरे लड़कों को फैशन शो में रैंप पर इठलाते हुए तो देखा ही होगा तुमने। ऑफ्टर ऑल इट्स जैन्टलमैन्स गेम।
वो सब तो ठीक है भाई... लेकिन जब तुम्हारे लड़के मैदान में मां बहन की गाली दूसरे देश के खिलाड़ियों को देते हैं तब तुम्हारा ये जैन्टलमैन्स गेम किस मुंह से सिर उठाता है। ओह वो तो ... वो तो आक्रामक क्रिकेट की एक बानगी भर है। सुना नहीं तुमने क्रिकेट अब आक्रामक खेल हो गया है। मेरे लड़के मैदान में गालियां और मारपीट नहीं करेंगे तो मीडिया की कवरेज कैसे मिलेगी। वैसे भी ये देश की शान का मामला है। अरे वाह भाई,अपने ही देश के तीसमार खानों को भुलाकर विदेशी कोच के हाथ पैर पकड़कर उसे बुलाना और अपने ही लड़कों की सरेआम बोली लगाने से देश की शान पर बट्टा नहीं लगता क्या? उफ्फ रहोगे ना तुम गंवार के गंवार। इट्स ए पार्ट ऑफ स्ट्रैटजी यार। विदेशी कोच को यहां खेल की चाही अनचाही नीतियों से दबाना जरा आसान होता है। और रही बात लड़कों को बेचने की तो इससे क्रिकेट ग्लोबल होता है। और ठीक ही कहा तुमने, हम करें भी तो क्या करें? हॉकी का बड़े से बड़ा मुकाबला जीतने पर भी मेरे लड़कों पर ना तो पैसे की बरसात ही होती है और ना ही मीडिया से उधारी की पहचान ही मिल पाती है। अच्छा राम- राम चलते हैं।
Thursday, June 12, 2008
भावनाओं का अंधड़
मदर्स डे के अवसर पर मैं एक प्रसिद्ध संगीत प्रतियोगिता प्रोग्राम टीवी पर देख रही थी। एक एक कर प्रतियोगी मंच पर आए और बेहद भावुक गाना गाकर सभी ने अपनी मां से जुड़े कुछ यादगार लम्हों को बताया। कुछ इस तरह कि दर्शकों के साथ साथ जजों की पलकें भी नम हो गई। कमरे में मेरी मां सोफे पर मेरे साथ बैठकर कार्यक्रम का लुत्फ उठा रही थी। मेरी नजर मां के चेहरे पर दौड़ी तो देखा आंसूओं का सैलाब उनकी आंखों से भी बह रहा था। मैं कुछ बोलना चाहती थी लेकिन उस पल चुप रहना ही बेहतर समझा। लेकिन इस सब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ये आंसूओं की धार सचमुच में धारदार है। या फिर वो नाटकीय पानी है जिसे बहाकर हम शायद अपनी वास्तविक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों से हाथ धो रहे हैं। ये धारा तब तो बहती है जब किसी सीरियल में मुख्य किरदार दम तोड़ देता है लेकिन उस समय क्यों नहीं जब किसी शराबी साहबजादे की कार के पहियों से कोई जिंदगी कुचल दी जाती है। और वो उसे मरता हुआ छोड़कर घटनास्थल से रफूचक्कर हो जाता है। हमारे गुस्से का गुबार तब तो फूटता है जब कोई पॉपुलर टीवी पात्र किसी षडयंत्र का शिकार बनता है लेकिन तब क्यों चुप्पी साध ली जाती है जब खचाखच भरी बस में किसी लड़की के साथ मनचले छेड़खानी कर आराम से चलते बनते हैं। भावनाओं का सैलाब तब तो जरूर उमड़ता है जब कोई प्रतियोगी बच्चा कम अंकों के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो जाता है लेकिन तब क्यों यही सैलाब ठंडा पड़ जाता है जब हम अपने ही घरों में नाबालिगों से नौकरों का काम लेते हैं। संवेदनहीनता की एक बानगी जयपुर में देखने को मिली। शुक्रवार को हुए धमाकों से कई परिवार लहूलुहान हो गए। लेकिन कुछ ही दिन बाद इसी जयपुर में आईपीएल मैचों का भव्यता से आयोजन हुआ। यकीनन क्रिकेट की इस मस्ती में मारे गए लोगों की खून से सनी लाशों को आसानी से नहीं भुलाया जा सकता। जी हां ये सही है कि जीवन सिर्फ बहने का ही नाम है लेकिन ये बहाव गर बिना दिशा बेतरतीब हो तो जीवन में तूफान ला देता है। कैसे नहीं जयपुर वासियों के साथ सारा देश सबीना नाम की उस बच्ची से जुड़ पाया जो इन धमाकों में अपनी मां और मौसियों को खो बैठी है। कॉरपोर्टे कल्चर की ही भाषा में कहूं तो क्या हमारी भावनाओं का निवेश इतना सस्ता हो गया है कि हम उसे यूं ही जाया कर दें। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हमारी संवेदनाएं, हमारे आंसू और हमारी भावनाएं इतनी भौंड़ी हो गई है कि पर्दें के काल्पनिक संसार के लिए तो उजागर हो सकती है लेकिन वास्तविक जीवन के उथल पुथल के बीज सिर्फ तमाशबीन बन कर रह जाती है।
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