Tuesday, December 14, 2010
२ जी स्पैक्ट्रम घोटाला फ़ाइल बंद
जी हां ये सच है। मैं ये दावे के साथ कह सकती हूं। ये सूचना उन सभी भारतवासियों के लिए है जो सोच रहे हैं कि २ जी स्पैक्ट्रम घोटाले की छानबीन का कुछ नतीजा निकलेगा या निकलने वाला है। कुछ नहीं होने वाला देश के सबसे शर्मनाक इस घोटाले का। बाकी सभी घोटालों की तरह ये भी सांठगांठ की भेंट चढ़ जाएगा। कोई भी समझदार भारतीय ये बात आसानी से समझ सकता है कि भैंस के आगे बीन बजाने से कुछ नहीं होने वाला। आखिर क्या हुआ भोपाल गैस कांड का, या फिर क्या हुआ रक्षा सौदों से जुड़े तहलका खुलासे का या फिर गोधरा कांड के पीछे छिपे असली दरिंदों का। और फिर भई स्पैक्ट्रम घोटाले में तो खबरों की खबर लेने वाले मीडिया के ही कुछ दिग्गजों के दिमाग भिड़े हुए हैं तो फिर इसका तो कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस शर्मनाक घोटाले में साफ सुथरी छवि रखने वाले हमारे भोले भाले प्रधानमंत्री का नाम भी सीधे-सीधे उछला है। उन्हीं के मंत्रालय की तरफ से लिखी गई चिठ्ठियां सार्वजनिक कर दी गईं हैं। तो फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये रहा कि आखिर जवाब देगा कौन और अपराधियों से जवाब लेगा कौन ? जनता के पैरोकार कुछ मीडियाकर्मी आज खुद सवालों के घेरे में हैं। राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मी और कॉरपोरेट सेक्टर की ये नापाक सांठगांठ एक घिनौने भ्रष्ट समाज की तरफ इशारा करती है। वो समाज जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई सत्ता के केंद्र में बैठे लोग मिलबांट कर मजे से उड़ा रहे हैं। छि: घिन्न आनी चाहिए हर भारतीय को इस गंदी सांठगांठ से। और सभी को मिलकर इन चुंनिंदा गंदी मछलियों को लोकतंत्र की पावन नदी से निकाल कर दूर फैंक देना चाहिए। ताकि ये किनारे पर सड़कर अपनी गति को प्राप्त करें।
Thursday, November 25, 2010
मां की याद में
... पहली बार महसूस हुआ कि तकनीक ने दुनिया कितनी बदल दी है। वेंटिलेटर की मदद से पता ही नहीं चलता कि आपके अपने ने कब संसार से विदा ले ली... कब आपको अलविदा कह दिया। वेंटिलेटर में डाली गई दवाओं के प्रभाव से वो अंत तक सांस लेती रहीं... लेती रहीं। मैं देखती रह गई और माजी ने मेरे सामने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सकी। डॉक्टर ने बताया कि वो जा चुकी हैं। मैं सन्न रह गई। वो लम्हा कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके साथ वो मेरी दुनिया भी ले गईं। मुझे बहू से बेटी बनाया उन्होने और अपनी बेटी को छोड़कर चलीं गईं वो। उसके बाद मुझे दुनिया की तमाम उन सच्चाईयों से रूबरू होना पड़ा जिनको देखकर, सुनकर मैं दुखी कम आश्चर्यचकित ज्यादा थी। माजी के जाने के बाद उनकी तेरहवीं के लिए मुझे बिहार अपने ससुराल जाना था। माजी के बिना घर सूना था, बहुत सूना। लेकिन जिस तरह से उनके जाने के तुरंत बाद आस-पड़ोस के लोगों, यहां तक कि अपनों ने जो व्यवहार किया वो बहुत अजीब था। सबकी आंखों में दुख कम एक अजीब सी बेचैनी देखी मैने। इंसान के जाने के बाद रीतिरिवाजों से घिरी दुनिया का आडंबर देखकर मन व्यथित हो उठा। पता नहीं किसने ये रिवाज बनाए जो जिंदा बचे सदस्यों को परेशान कर देते हैं। किसी चीज में मेरा बस नहीं था सो जो सबने कहा मैने किया। खैर, घर की मालकिन के जाने का दुख घर के हर कोने में था। हर खिड़की से झांकता मेरा अतीत मेरे वर्तमान पर हंसता नज़र आया। हर दीवार, हर बर्तन पर माजी की छाप थी। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि माजी हमेशा जिंदा रहेंगी। हमारी यादों में, हमारी बातों में और उस अहसास में जो वो आखिरी वक्त में हमें देकर गईं। वो जहां भी हों, खुश और शांत रहें।
Saturday, October 9, 2010
एक रात की बात
... पुतलियां डगमगाई तो देखा कि कालिख पुती वो रात चल बसी। ना जाने और क्या क्या हुआ उस रात। भर रात जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों से पर्दा नुचता गया। हां मैने देखा खुद अपनी आंखों से... मौत से जिंदगी की भीख मांगती सांसों को। उस रात हम अपने मरीज के साथ हर हॉस्पिटल की चौखट पर गए लेकिन बीमार बिलबिलाती भीड़ से अस्पताल पटे पड़े थे। क्या पता था कि रात की चादर में कितने कांटे बिछे हैं। आखिरकार आरएमएल में शरण मिल ही गई। इमरजेंसी का वो दृश्य आज भी आंखों में तैर जाता है। स्ट्रेचर पर अधजली हालत में कुछ ढका, कुछ खुला सांसे लेता वो शरीर, खून से लथपथ वो आदमी, कराहती सिकुड़ी वो बुढ़िया और बदहवास तीमारदार। हमारे सामने वाले स्ट्रेचर पर एक बूढ़ी के हाथ-पैर दबाता उसका हमसफर बार बार ऊंघ रहा था। क्या करे बेचारा रात का वो पहर आमतौर पर नींद में गोते लगाने का ही होता है लेकिन अचानक पत्नी को पैरालाइसिस का अटैक पड़ गया। सो ना जाने कब से अपनी रोती बिलखती पत्नी के अंगों को दबाकर उसे शांत करने की असफल कोशिश में जुटा था। इंजैक्शन और दवाई की बदबू से मन भारी हो गया। सुबह से ही परेशान मन कहीं पलभर बैठने की जगह ढूंढने लगा लेकिन वहां उस माहौल में ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीबवालों को ही मिल रही थी। कई बदकिस्मत ऐसे भी थे जिनको इमरजेंसी में घुसने का मौका तक नहीं मिला। वो लोग बाहर बैठे लाचार तरसती नजरों से जगह खाली होने का इंतजार कर रहे थे। बीमारों को आसरा अस्पताल का और अस्पताल खचाखच भरे हुए। एक अदद स्ट्रेचर की तलाश में तीमारदार लगातार बस भाग रहे थे। गुमसुम घबराए सभी चेहरे एक बूंद आंसू बहाने को वक्त तलाशते दिखे लेकिन मरीज को कुछ हो ना जाए, इसकी चिंता रोने की इजाजत भी नहीं दे रही थी। इस सब के बीच अचानक जोर से चिल्लाने की आवाज आई। और फिर कई आवाजें एक साथ मिल गईं। मैं भागकर उस दिशा में गई तो पांव फर्श पर जम गए। आंखे पथराईं और जीभ बाहर... एक शरीर से सांस टूट चुकी थी। अब तो घबराहट अपने चरम पर थी।
खैर कई घंटों बाद हमारे मरीज को एक वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन चैन को भी चैन ना था उस रात। अभी शिफ्ट हुए ही थे कि धड़धड़ाते हुए तीन डॉक्टर्स वॉर्ड में घुस गए और १५-१६ साल के बच्चे की छाती को दबाकर पंप करने लगे। बच्चे की सांसे लगभग जा चुकी थीं फिर भी डॉक्टर्स की कोशिश लगातार जारी थी। जिंदगी और मौत की ऐसी जंग पहली बार देख रही थी। 10 मिनट तक ये सिलसिला जारी रहा. पंप... पंप... पंप और फिर... सांस लेने की आवाज। आखिरकार बच्चे की सांसे वापस आने लगीं मतलब जिंदगी जंग जीत गई। इस बीच अचानक घड़ी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सुई पांच पर अटकी हुई थी। मैं इमरजेंसी के बाहर निकली। सुबह अंगड़ाई ले रही थी। अपनी चिर परिचित खुशबू के साथ अलसाए संसार में जान फूंक रही थी। लंबी लंबी सांसें भरने के बाद मैं दोबारा इमरजेंसी के अंदर गई तो लगा कि नजारा बदल चुका है। धीरे धीरे वहां शांति ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। फर्शों की सफाई हो रही थी, कई मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका था। जिनके अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया था वो भी रात भर रोकर अब आगे की कार्रवाई को शांति से निपटाने में व्यस्त थे। लगा कि इस सुबह का कितनी देर से इंतजार था मुझे। शांत, शीतल और सात्विक.
खैर कई घंटों बाद हमारे मरीज को एक वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन चैन को भी चैन ना था उस रात। अभी शिफ्ट हुए ही थे कि धड़धड़ाते हुए तीन डॉक्टर्स वॉर्ड में घुस गए और १५-१६ साल के बच्चे की छाती को दबाकर पंप करने लगे। बच्चे की सांसे लगभग जा चुकी थीं फिर भी डॉक्टर्स की कोशिश लगातार जारी थी। जिंदगी और मौत की ऐसी जंग पहली बार देख रही थी। 10 मिनट तक ये सिलसिला जारी रहा. पंप... पंप... पंप और फिर... सांस लेने की आवाज। आखिरकार बच्चे की सांसे वापस आने लगीं मतलब जिंदगी जंग जीत गई। इस बीच अचानक घड़ी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सुई पांच पर अटकी हुई थी। मैं इमरजेंसी के बाहर निकली। सुबह अंगड़ाई ले रही थी। अपनी चिर परिचित खुशबू के साथ अलसाए संसार में जान फूंक रही थी। लंबी लंबी सांसें भरने के बाद मैं दोबारा इमरजेंसी के अंदर गई तो लगा कि नजारा बदल चुका है। धीरे धीरे वहां शांति ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। फर्शों की सफाई हो रही थी, कई मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका था। जिनके अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया था वो भी रात भर रोकर अब आगे की कार्रवाई को शांति से निपटाने में व्यस्त थे। लगा कि इस सुबह का कितनी देर से इंतजार था मुझे। शांत, शीतल और सात्विक.
Sunday, September 12, 2010
... और खोज जारी है
तन्हाई के इस पार, उस पार
झांकू मैं आखिर कितनी बार
मालूम है कि आंचल फैलाए
खड़ी है तू इंतजार में
रास्ता छोटा पर दूरी बड़ी है
मन से बाहर, व्याकुल मन से बाहर
आता नहीं क्यों वो
खुद बाहर आता नहीं
ना आने देता भीतर तुझे
जम गया अवसाद है शायद
रिस रिस कर टपकता है शायद
शांति, संतुष्टि या निजता के पलों को
तन्हाई के तरन्नुम में खोजता मन
खुशियों के पलों में दुख को
खोदता, टटोलता अंशात मन
वो कुछ जो ना मिल सका
उस कुछ की खोज में
नित नई खोज पर निकला
तन्हा, बावरा मेरा मन
झांकू मैं आखिर कितनी बार
मालूम है कि आंचल फैलाए
खड़ी है तू इंतजार में
रास्ता छोटा पर दूरी बड़ी है
मन से बाहर, व्याकुल मन से बाहर
आता नहीं क्यों वो
खुद बाहर आता नहीं
ना आने देता भीतर तुझे
जम गया अवसाद है शायद
रिस रिस कर टपकता है शायद
शांति, संतुष्टि या निजता के पलों को
तन्हाई के तरन्नुम में खोजता मन
खुशियों के पलों में दुख को
खोदता, टटोलता अंशात मन
वो कुछ जो ना मिल सका
उस कुछ की खोज में
नित नई खोज पर निकला
तन्हा, बावरा मेरा मन
Thursday, September 9, 2010
आ जाए तू अगर...
अधूरी कहानी छोड़ी थी वहां
एक सिरा मिल जाए तो बस
बात बन जाए
कसमसाती धड़कनें चलने लगें
तू आवाज दे तो बस
बात बन जाए
क्यूं ढांक दूं मैं ये जख्म
तेरे प्यार ने जो दिया
तू आकर इसे छू जाए तो
बस बात बन जाए
सब सपने, वादे, इरादे
देख धुंधलाने लगे हैं
अपने अहसास से इन्हें
छंटा दे तो बस
बात बन जाए
वक्त अभी भी है जीने को
बस तेरा साथ मिल जाए
तो बात बन जाए
एक सिरा मिल जाए तो बस
बात बन जाए
कसमसाती धड़कनें चलने लगें
तू आवाज दे तो बस
बात बन जाए
क्यूं ढांक दूं मैं ये जख्म
तेरे प्यार ने जो दिया
तू आकर इसे छू जाए तो
बस बात बन जाए
सब सपने, वादे, इरादे
देख धुंधलाने लगे हैं
अपने अहसास से इन्हें
छंटा दे तो बस
बात बन जाए
वक्त अभी भी है जीने को
बस तेरा साथ मिल जाए
तो बात बन जाए
Friday, August 27, 2010
ममता मतलब मां
मां, खुद में परिपूर्ण है ये शब्द। इस शब्द को सुनकर ही मन में आस्था, प्यार और ममता एक साथ हिलोरे लेने लगते हैं। शादी से पहले मेरे लिए मां सिर्फ और सिर्फ जन्म देने वाली कोख का ही नाम था। क्या करूं कि समझ ही इतनी थी। लेकिन विवाह के परिणय सूत्र में बंधने के बाद मस्तिष्क कुछ और खुला। रिश्तों के मायने कुछ और समझ आने लगे। मन की गांठ ढीली पड़ने लगी और मां शब्द का सही अर्थ समझने लगी मैं। शादी के बाद अपना घर परिवार रिश्ते-नाते छोड़कर एक बिल्कुल नए परिवेश में जाकर समाना इतना आसान नहीं होता। लेकिन वहां(मेरे ससुराल में) भी मुझे एक मां मिली। बहुत प्यार करने वाली और मेरा बहुत ख्याल रखने वाली, मेरी सासू मां। आज मेरे लिए मां महज जन्म देने वाली नहीं बल्कि ममता का दूसरा नाम ही मां है। मेरी सासू मां की तबीयत बहुत खराब है, उनका शरीर भी धीरे-धीरे ढलने लगा है। जीवन को समझने का एक नया नजरिया जिसने मुझे दिया वो आज खुद जीवन से हार मान बैठी हैं। सिर्फ उनके जरिए मैने जाना कि आखिर कैसे पराये अपने हो जाते हैं। आखिर क्यों उनके दुख से आपकी आंखे भर आती हैं। मेरी सासू मां ने बहुत कम समय में ही मुझे वो सब कुछ सिखाया जो ताउम्र जीवन को सुगम और सफल बनाने में मेरी मदद करेगा। और सबसे बड़ी चीज जो उन्होने मुझे सिखाई वो है संवेदनशीलता और सब्र, जो परिवार को चलाने के लिए एक बड़ी पूंजी है। बहुत बीमार होने के बावजूद आज भी वो जब लड़खड़ाती जुबान से मुझसे पूछती हैं कि कंचन खाना खाया क्या... बस आंखें नम हो जाती हैं। मां आप जल्दी से ठीक हो जाएं बस ईश्वर से यही एक चीज मांगती हूं...
Sunday, August 22, 2010
जिंदगी ए जिंदगी
जिंदगी तेरे आगाज परमैं फिर से जीने लगी हूं
अब अंजाम तू ही देखना
रात की बाहों में पला सपना
भोर के उजास में पैरों तले
कुचला ना जाए, तू देखना
हौसलों से सींचीं मन की बगिया
कहीं बागबां की ठोकर से
उजड़ ना जाए, तू देखना
देखना कि स्वाभिमान की सांसें
यूं ही चलती रहें निरंतर
देखना कि अच्छाई की डगर से
पैर फिसल ना जाए किसी पल
तू ही देखना तुझ पर मेरा भरोसा
कोई लुटेरा ना लूट जाए कहीं
दे गर तू लाख मुश्किलें
तो समझदारी का अमृत भी
मुझ प्यासे रेगिस्तान में हो
तू देखना ए जिंदगी
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