Pages

Tuesday, May 13, 2014

कुछ सच्चाईयां...

लिखने का कुछ मन तो है
पर रचना का आकार
ना जाने क्या होगा?
क्या होगा जब
मन की किताब से धूल झड़ेगी,
और पन्नों का तब हाल
ना जाने क्या होगा?
मेरे सपनों का वो अनुपम संसार
मेरी अपनी दुनिया, इस दुनिया से पार
मेरे अस्तित्व के संघर्ष की कथा
कभी कैद, कभी स्तब्ध
अंजान, गुमसुम सी व्यथा
कह तो दूं सब कुछ मगर,
दिल में दबे उस राज के
रौशन हो जाने के बाद
ना जाने क्या होगा?  
क्या हो गर मन दे आदेश 
लेकिन अक्षर ही बगावत कर दें
ना लिखने दें, ना कहने दें
अवसाद को अविरल ना बहने दें
सोचती हूं कि डर किसका ज्यादा है
अन्जानों का या अपनों का
या फिर अपनों से बंध चुके
मेरे ही कुछ सपनों का
फिर सोचा क्यों ना तन्हा ही
इस किताब के पन्ने पलट लूं
ढके, छिपे उस कठोर सत्य
से टरकाने का अंजाम
ना जाने क्या होगा...

Tuesday, July 24, 2012

प्रकृति से दो बात

इससे पहले कि
कोई मुझे पुकार ले
कि मैं व्यस्त हो जाऊं
इससे पहले कि
दिन शुरू हो और
अंतहीन सिलसिला चलेे निकले
इससे पहले कि
मेरा लाडला उठे और
उसे गोद में मैं उठाऊं
इससे पहले कि
मोह-माया मुझे खींचे
और मैं फिर बंध जाऊं हिंदी
चल चलें कुछ पल के लिए
जहां सबसे पहले
तू मेरे लिए, मैं तेरे लिए
जहां सबसे पहले
तू गोद में ले मुझे, सहलाए
जहां सबसे पहले
मैं पवन संग उडूं, तू गाए
पत्तों को छुऊं, तू गुनगुनाए
लंबी सांस लूं , तू लहराए
मैं तेरी खूबसूरती निहारूं
तू मेरी कमियां गिनाए
जहां सबसे पहले
हम खुशी और संतुष्टि
की दूरियां घटाएं
कुछ ऐसे कि एक-दूजे में
ये घुल-मिल जाएं
चल फिर एक बार आज
      सृजन करें
एक निच्छल कविता का.





Monday, July 23, 2012

कपड़ों पर कांय-कांय

सारा का सारा गांव जमा था भौजी के घर भोज में... भौजी के घर लक्ष्मी ने जो दस्तक दी थी. नाम रखा गया खुशी. जैसे कि परंपरा थी सारा गांव एक साथ एक कतार में भोज में खाने के लिए बैठा. रामदीन ने कहा अरे भई सलाद तो दो कि खाना खत्म होने पर तुमरे सलाद की थाली लुगाई की तरह बाहर निकलेगी. सभी हंस दिए तो जमुना बोली क्या चाचा आप भी, लुगाइयां तो खाना परोसने में लगी हैं जरा सब्र तो करो. एक तरफ से आवाज आई अरे भई जल्दी जल्दी खाना खाओ फिर जमुना के घर वो आमिर भाई का नया नाटक शुरू हुआ है वो भी तो देखना है. दूसरी आवाज आई अरे क्या खाक देखना है सभी नाटक तो एक तरह के ही हैं. छोटे-छोटे कपड़े पहन कर बेशरम लड़कियां खड़ी कर देंगे और आधा घंटा बस उन्हें ही निहारते रहो. फिर कोई बोला- नहीं भई ये कार्यक्रम ऐसा नहीं है ये तो कुछ अलग है, समाज की आंखे खोल देगा, ऐसा कुछ बता रहे थे टीवी पर. जवाब मिला- अरे खाक डालो ऐसे टीवी पर जहां देखो अश्लीलला फैली हुई है. परिवार के साथ तो आप देख ही नहीं सकते एक भी मिनट. मैं तो कहता हूं कि वो जो गुवाहाटी में उस बेशरम लड़की के साथ हुआ एक तरह से ठीक ही हुआ. उसके कपड़े देखे आपने. और तो और वो क्या कहते हैं उसे दारूखाना...हां  पब-वब से बाहर आ रही थी. कोई दूध की धुली तो ना होगी वो छोरी. फिर रात को घर से अकेले निकलने को कहा किसने है. जमाना देखा है, कितना खराब है. कतार में बैठे सभी मर्दों ने चाचा की इस बात पर हामी में सिर हिला दिया. ये सारी बातें सुनकर जमुना तैश में आ गई. चाचा क्या बोले जा रहे हो- अरे जमाना आपसे और हमसे ही तो बनता है. उस लड़की के साथ जो कुछ हुआ उसमें उसके कपड़े कहां से आ गए. मैने देखा है कि टीवी पर, वो लड़के पहले उसे छेड़खानी कर रहे थे तभी ये सब कुछ हुआ. बेचारी लड़की. हाय... काहे की बेचारी. अपने मां-बाप का नाम डुबो दिया ससुरी ने. अरे जो उसके साथ हुआ वो तो किसी के भी साथ हो सकता है, ये सब तो मर्दों के दिमाग की गंदगी है. जो लड़की को सिर्फ भोग की चीज समझकर उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित करते रहते हैं. ये सब तो आजकर सड़कों पर, बसों में औऱ कालेज जाते वक्त किसी भी लड़की के साथ आए दिन होता रहता है. लेकिन बेचारी लड़कियां चुप होकर रह जाती हैं. उस लड़की ने इसका विरोध किया तो इसकी ये सज़ा. तभी गांव के सरपंच बोले अरी जमुना तू काहे उसका इतना साथ दे रही है उस लड़की का गलत चरित्र ही इसके लिए जिम्मेदार है. अब जमुना गुस्से से उबल पड़ी. सरपंच जी आपको उसके चरित्र के बारे में इतना कैसे पता. ऐसे कपड़े पहनो, ऐेसे चलो, रात को घर से ना निकलो...आखिर क्यों नहीं. पढ़ाई तो हम लड़कियां भी करती हैं तो हम काम क्यों ना करें. क्यों ना अपने मन की जिंदगी जिएं. और फिर आखिर यही सब होना है तो क्यों ना कपड़ों को तिलांजली दे दी जाए. पूरे कपड़ों से ढकी लड़की के साथ भी गलत होता है तो कपड़ों से तन ढकने का अर्थ ही क्या है. सरपंच जी जमाना तो आगे बढ़ गया है लेकिन सोच वहीं की वहीं है आपकी. मैं कहती हूं कि सारा दोष पुरूषवादी मानसिकता का है जो शरीर को भोग की वस्तु समझता है. संतुष्टि का मतलब नहीं समझता है और मन पर काबू रखना नामर्दी की निशानी मानता है. आखिर सभी कुछ आप ही तय कर लेंगे तो औरत इस दुनिया में सिर्फ जन्म देने के लिए है क्या. समाज को सुधारते नहीं और चले हैं चरित्र और कपड़ों पर टिप्पणी करने. अरे सारी की सारी कानून व्यवस्था मिलकर भी मन को काबू करने का एक फार्मूला तैयार करके दिखा दे तो मानूं. फिर गलती किसकी कपड़ों की. वाह जी तो क्यों बनाए ऐसे कपड़े जो कोई पहन भी ना पाए.  कतार में बैठे सभी लोग चुप थे लेकिन असमत भी. कुछ तो गुस्से में आधा खाना छोड़कर उठ गए. फिर भौजी ने मोर्चा संभाला. बोली- देखिए नाराज मत होइए लेकिन सच यही है कि मानसिकता से ऊंचा और इससे नीचा कुछ भी नहीं. औरत को इज्जत देना सीखेंगे तो ही समाज का मतलब है नहीं तो किसी को भी बहुत अधिक दबाने पर बदलाव नहीं क्रांति होती है और अराजकता फैलने का खतरा रहता है. बात तो खत्म हो गई लेकिन क्या वाकई बात सिर्फ इतनी सी ही है?
   

Saturday, October 29, 2011

वो अनुभव...पहला पहला

जी हां, पता है कि बहुत दिन हो गए हैं लैपटॉप पर अंगुलियां नचाते हुए। बहुत पानी बह गया इन बीते दिनों में। बहुत कुछ बदल गया है; कुछ मेरे अंदर और बहुत कुछ मेरे आस-पास। हम दो से तीन हो गए। उसे अपने भीतर तो महसूस कर रही थी लेकिन सामने देखकर आंखें नम हो गईं। उसके नन्हे हाथों ने और कोमल अहसास ने सारे दुख भुला दिए। वो आया औऱ आते ही मुझे व्यस्त कर दिया। मेरी दुनिया को ढेर सारे रंगों से भर दिया। अब पता चला कि दुनिया की सबसे बड़ी खुशी क्या है। मुझे मेरे नाम से बढ़ाकर मां का दर्जा देकर उसने मुझे धन्य कर दिया। हर अनुभव पहला ही होता है लेकिन ये अनुभव हर मां को जीवन भर याद रहता है। मैंने अपने शरीर के इस हिस्से का नाम अंश रखा है। मुझे अहसास हो रहा है कि मुझ पर अब कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। उसे एक अच्छा इंसान, एक जिम्मेदार नागरिक औऱ संवेदनशील प्राणी बनाने का भार मुझ पर है। बात सिर्फ इतनी है कि एक नन्ही जान को जन्म देना ही बड़ी बात क्या है, बात तो उसे अच्छे संस्कार देना और अपने आस पास की दुनिया के समझने की सही समझ देना है। जो सिर्फ हम कर सकते हैं। तो क्यों नहीं हम उन्हें परियों की कहानी सुनाने के बदले अन्ना का संघर्ष सुनाएं। उन्हें देश पर प्राण न्योच्छावर करने वाले वीरों के बारे में बताएं। क्यों ना उन्हें असलहों के बदले कलम के महत्व से रूबरू करवाएं। मैं तो ऐसा करने वाली हूं और आप सभी से भी ऐसा ही करने की आशा करती हूं.

Sunday, June 5, 2011

अगुवाई की छवि से बाहर निकलो

शनिवार की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ उसे देखकर तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि बेचारा सत्याग्रह, बेचारा आंदोलन और बेबस जनता। ना मुद्दा रहा, ना आंदोलन और डंडे पड़े सो अलग। और फिर मीडिया तो बाबामय हो ही गया है। मुहिम जाए भाड़ में। वैसे एक बात है भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। हां ऐसा नहीं होना जरूर चमत्कार कहा जा सकता है। इस घटना के बाद अब जरा आप मिस्र और भारत की तुलना कीजिए। भारत जैसा बड़ा विकासशील देश, करोड़ों की जनसंख्या से लदा और प्रगति के पथ पर अग्रसर इस देश के आगे मिस्र तो कहीं भी नहीं ठहरता। लेकिन उस देश में बिना किसी अगुवाई, बिना किसी नेता या बाबा के ऐसी ऐतिहासिक क्रांति हुई कि तहरीर चौक हमेशा के लिए अमर हो गया। तानाशाह सरकार के पांव उखाड़ने के लिए वहां एक साधारण सी लड़की ने मोबाइल पर मैसेज और वीडियो का सहारा लिया। बस फिर क्या था सारी जनता इस मुहिम में जान हथेली पर लेकर जुट गई। अब जरा लौट कर आते हैं भारत की सरजमीं पर। यहां हमें यानि जनता को किसी अन्ना या फिर किसी बाबा की अगुवाई की सख्त जरूरत महसूस होती है। हमारी ये जरूरत सत्ता खूब जानती है तभी तो जनहित में शुरू हुई कोई भी मुहिम राजनीति की कुटिल चालों की आसानी से शिकार हो जाती है। अन्ना हजारे की लोकपाल बिल मुहिम पर कभी सीडी कांड तो कभी सदस्यों के बीच असहमति की गाज गिरती ही रहती है। और फिर बाबा रामदेव का शुरू किया गया आंदोलन महाभारत की युद्धभूमि में बदल गया। मैं पूछती हूं आखिर मिला क्या। काला धन और भ्रष्टाचार मुद्दा तो हवा हो गया और तो और बाबा की जनहित मंशा पर भी सवालिया निशान लग गये हैं। इस सबसे नुकसान सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की मुहिम को हुआ है। बाबा और सरकार के बीच गुपचुप या सार्वजनिक रूप से जो कुछ भी हुआ उसपर हमें और आपको शर्म आनी चाहिए। बाबा की जादुई छवि में भ्रष्टाचार आंदोलन का धुलना हमारी हार ही तो है। सत्ता तो स्वार्थी है ही, फिर बाबा भी अपनी छवि बढ़ाने के फेर में फंसते चले गए। वैसे वक्त अभी भी है। ये हमारी समस्या है। इसके लिए कोई बाबा क्यों अगुवाई करे। क्यों ना हम आप ही मिलकर इसे सफल बनाएं।

Friday, February 4, 2011

... यूं ही एक दिन

"...कितनी सुन्दर लगेगी, वैसे भी चंचल का रंग उस लड़की से ज्यादा साफ है। और फिर चंचल यकीनन उससे कई गुना सुंदर है", अचानक आशीष ठिठककर रुक गया "अरे मैं भी पागल ही हूं, क्या अपने आप से बड़बड़ाए जा रहा हूं। फिर मैने उस लड़की को देखा ही कहां। लेकिन जो भी है, सुनील ने बताया तो था कि वो लड़की जरा पक्के रंग की है लेकिन सुंदर है"। हल्की सी मुस्कान होंठों पर तैरने लगी और आशीष सिर झटककर आगे बढ़ गया। आज तो जैसे सारी दुनिया को चीरकर बस किसी तरह जल्द से जल्द घर पहुंचने को आतुर था आशीष। बेसब्र मन पंख लगाकर घर की चौखट पर जा गिरने को है।
हर रोज घर से बस स्टैंड और बस स्टैंड से घर तक के पैदल सफर में आशीष न जाने कितनी बार रास्ते में आने वाली लगभग हर चीज को मनभर गाली देता, कोसता। फिर चाहे वो सड़क के कोने में खड़ी फूस की अवैध झुग्गियां हों, ऊपर तक भरे गंदे नाले हों, प्रशासन की उन्हें हटाने में नाकामी की दास्तां हो, धूल-धुआं या फिर मंजिल तक पहुंचने की होड़ में भागती गाड़ियों का शोर। हर उस साये से नफरत है आशीष को जो इस गंदगी के करीब ले जाए उसे। कभी सरकार की विफलता, तो कभी शराब के ठेके पर धुत शराबियों का दिन भर की ढियाड़ी को जहर के गिलास पर मस्ती से उड़ाना, कभी पानी की बूंद-बूंद के लिए सड़क के बीच मारपीट तो कभी सर्द मौसम में दो चिथड़ों टांगे नंगे पांव साइकिल का टायर घुमाते बच्चे। मुश्किल से पंद्रह मिनट का वो रास्ता आशीष के लिए आधे घंटे में बदल जाता।
"इस इलाके में रहना अच्छा तो नहीं लगता यार लेकिन क्या किया जाए। साली नौकरी की मजबूरी और तंग हाथ सब कुछ कराता है", आशीष अपने दोस्त सुनील से रोज यही कहता।
लेकिन आज... आज बात कुछ और ही है। कुछ सोचकर मन की तरंगें कुलांचे भरने लगीं। पैरों का भारीपन, ऑफिस की थकान और झुग्गी का वो उबाऊ माहौल, कुछ भी तो उसे विचलित नहीं कर पा रहा है। आज उसकी आंखों के सामने प्यारी सी चंचल खड़ी है। सुर्ख गुलाबी सूट में और हां... वही गुलाबी सैंडि़ल भी पहनी है छुटकी ने। वो घूम रही है बार-बार। थोड़ा आगे चलती, थोड़ा पीछे फिर किसी फिल्म की हीरोइन की तरह बलखाकर चाल दिखाती। "... अरे अरे जरा संभलकर। गिर जाओगी" कहकर आशीष ने झट से दोनों हाथ रक्षात्मक मुद्रा में आगे बढ़ा दिए। नजरें इधर-उधर दौड़ाईं तो चंचल ओझल हो चुकी थी।
आशीष शरारती मुस्कान चेहरे पर लिए आगे बढ़ गया। लेकिन ये क्या... घर की तरफ बढ़ते कदम अचानक धीमे क्यों पड़ गए? उमंगों के इस शांत सागर में दूर से चली आ रही इन विरोधाभाषी लहरों का रुख इस ओर क्यों है? "ये मुझे क्या हो रहा है। एक पल पहले तक तो मैं खुशी के सागर में डुबकियां लगा रहा था लेकिन फिर दूसरे ही पल मन उदास सा क्यों होने लगा है" आशीष को कुछ समझ में नहीं आया। उसने सिर नीचे किया फिर उंगलियों को बालों में पीछे की ओर नचाया और बस... उदासी की वजह गुलाब दुपट्टा ओढ़े सामने ही खड़ी थी। जिस अनचाहे डर को बस से उतरकर इतनी देर से भुलाने की कोशिश करता रहा आशीष, वही डर उसके सपनों की रंगीन दुनिया को काला करने की कोशिश में कामयाब हो रहा था।
अभी कुछ देर पहले की ही तो बात है। हर एक सीन उसकी आंखों के आगे नाचने लगा। सुनील के साथ घर वापस लौटते हुए किस्मत से आज बस में एक सीट खाली मिली। धप्पाक से मैं उस सीट पर बैठ गया। आधे घंटे बाद एक तेज झटके ने मेरी नींद तोड़ दी। मेरे चेहरे पर गुस्से और फिर खुशी के मिले जुले भाव उभर आए। गुस्सा नींद टूटने की झुंझलाहट का साक्षी था और खुशी मिली मुझे उस भीनी सी परिचित खुशबू से। गर्दन घुमाकर अपनी बायीं ओर देखा तो ठीक मेरे सामने गुलाबी सूट पहने एक लड़की भीड़ में जगह पाने की जद्दोजेहद में थी। एक बारगी तो मन हुआ कि उठ जाऊं और फिर मैं लेडीज़ सीट पर बैठा था लेकिन रास्ते की दूरी के अहसास ने त्याग की बलवती इच्छा को दबा दिया। उस लड़की का चेहरा तो नहीं देख पाया लेकिन उसी गुलाबी सूट में सजी अपनी छुटकी की कल्पना जरूर की। कब से पीछे पड़ी है "भइया गुलाबी सूट और गुलाबी सैंडिल ला दो ना"। बिल्कुल... इस बार तो छुटकी की इच्छा गुलाबी चुनरी जरूर ओढ़ेगी। आखिर बोनस के पैसों से सबसे पहला काम यही तो करना है। ये सोचकर आशीष की आंखों में चमक आ गई। इसी बीच बस में हलचल के साथ शोर-शराबा बढ़ गया था। कुछ मनचले शायद बहुत देर से गुलाबी सूट वाली लड़की को छेड़ रहे थे। मेरी सीट के पास खड़े सुनील ने मुझे कोहनी मारकर कहा " देख ना आशु, उसका यार भी आ गया है पीछे से। हां भाई... इस जैसी सुंदरी को बचाने नहीं आएगा तो क्या तुझे या मुझे बचाएगा। वैसे बड़ा किस्मत वाला है जो ऐसी पटाखा मिली है, क्या कहते हो"? शोर बढ़ रहा था। देखते ही देखते बात हाथापाई पर उतर आई। भीड़ की वजह से ज्यादा तो कुछ नहीं देख पाया हां लेकिन उन बदमाशों ने लड़की का दुपट्टा खींचकर उसे बस से नीचे धक्का दे दिया। लड़की का दाया हाथ विपरीत दिशा में तेजी से आते एक दुपहिया स्कूटर के नीचे आ गया। लड़की चिल्लाती रही। मैं, सुनील और बस में बैठे सभी यात्री चुप थे। बुत बनकर केवल तमाशा देखा जा रहा था। "ओफ्फ यार... मैं ही अकेला क्या करता। और भी तो लोग थे बस में, सभी चुप थे। और फिर उन सालों का क्या भरोसा। कहीं चाकू-छुरी निकाल लेते तो फालतू में मैं तो जाता ना जान से। और फिर वो लड़की भी कुच वैसी ही लगी। कोई दूध की धूली हुई तो नहीं थी आखिर अपने ब्यॉयफ्रेंड के साथ जो थी। जाने घरवालों से क्या बोलकर निकली थी। छि: क्या जमाना आ गया है"। ऐसी-वैसी ढेर सारी बातें मन में सोचकर उस उमड़ते काले तूफानी साए को आशीष ने शांत करने की भरपूर कोशिश की। आशीष सोच में ही डूबा था कि उसे अहसास हुआ कि उसके कदम घर की चौखट पर आ पहुंचे हैं। उसे थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ क्योंकि घर का दरवाजा अधखुला था। बैग सोफे पर फैंका और टाई ढीली करते हुए चिल्लाया- छुटकी...छुटकी... अंदर से कोई आवाज नहीं आई। आशीष कुछ सोचकर मुस्कुराया। "अच्छा बाबा छुटकी नहीं, तू अब बड़ी हो गई है। नाराज मत हो मैं तुझे तेरे नाम से ही बुलाऊंगा। चंचल अब तो बाहर आ और हां वो कांच के गिलास में ही पानी लाना"।
बहुत देर तक कोई हलचल ना होने पर आशीष का मन किसी आशंका के डर से घबराया। वो उठा और चंचल का कमरा, किचन, अपना कमरा, घर के पीछे छोटा सा बगीचा सभी जगह टटोला। " घर तो खाली है आखिर कहां गई चंचल"। तभी घड़ी ने आठ बजे का घंटा बजाया और चिंता की लकीरें उसकी माथे पर गहरा गईं। शायद जिस तूफान की आशंका उसे सता रही थी वो आ चुका था। आशीष ने खुद को उस तूफान की गिरफ्त में कसता हुआ महसूस किया। अचानक किसी के कदमों की आहट ठंडी पवन का झोंका संग लेकर आई। उसने सिर उठाया तो देखा कि मां सामने खड़ी है। मां के पैरों में दोनों हाथ टिकाककर उसने कहा "पाय लागू मां, अरे आप... कब आईं ? मुझे फोन कर देतीं, मैं स्टेशन पर लेने आ जाता। अच्छा आपने ही छुटकी को कहीं भेजा होगा और मैं कबसे चिंता कर रहा था"। ये सब आशीष ने एक सांस में ही कह डाला जैसे कुछ भी नकारात्मक सुनने से खुद को रोक रहा हो। फिर पलटा और मां के लिए एक गलास ट्रे में रखकर वहीं एक कोने में बोनस समेत अपनी सैलेरी सजा दी।
"आशु बेटा, मैं तो सुबह ही आ गई थी। पड़ोस का संजू ही मुझे स्टेशन पर लेने पहुंच गया था। इस बार छुटकी के लिए उसका मनपसंद गुलाबी सूट और सैंडिल ले ही आई। सोचा क्या करेंगे पैंशन के पैसों का जब छुटकी के असमान भी पूरे ना कर पाए तो। मन पक्का किया और बड़े बाजार से सस्ते सौदे में ले आई। वही पहनकर तो गई है सुषमा को चिढ़ाने। और बेटा अकेली थोड़े ही गई है हमारा गबरू जवान संजू भी तो उसके साथ गया है। जिद करने लगा, मैं भी दीदी के साथ जाऊंगा। मैं उसी के घर से तो आ... "। मां शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि आशीष के हाथों से डगमगाती ट्रे जमीन पर गिर गई। कांच का गिलास छिटटकर कई टुकड़ों की शक्ल में कमरे में फैल गया। उसकी आंखों के सामने अब घुप्प अंधेरा था। लगा कि जैसे कमरे में वो अकेला है। बेसहारा, बेबस। वो प्यारी सी छुटकी की आकृति... गुलाबी सूट में जाने क्यों धीरे धीरे दूर जा रही थी। और सूट की दायीं बाजू में ये लाल रंग कैसा है। और ठीक उसी पल वो शर्मनाक वाकया उसकी आंखों के सामने तैर गया। आशीष चिल्लाया " मैं उसे बचा सकता था। मैं... मैं अगर हिम्मत करता तो चिल्लाकर भीड़ इकठ्ठी कर सकता था। शायद वो गुंडे डर जाते। वो लड़की... वो गुलाबी सूट बच जाता। हे भगवान, उस लड़के ने मेरी छुटकी को बचा लिया हो। शुक्र है कोई तो था छुटकी के साथ"। मां बेहद आश्चर्य से आशीष को निहार रही थी। एक दो बार उसे सम्भालने की नाकाम कोशिश भी की। आशीष से ध्यान हटा तो मां ने ट्रे की तरफ देखा तो सफेद लिफाफा पूरी तरह भीग चुका था और अंदर पड़े नोट भी। मां जल्दी से भीगे नोट बटोरने लगी।
"बहुत देर हो चुकी है मां। कोई फायदा नहीं... कोई फायदा नहीं", बड़बड़ाता हुआ आशीष दरवाजे की तरफ गया और नंगे पांव ही गंदी बस्ती की तरफ दौड़ पड़ा।

Tuesday, December 14, 2010

२ जी स्पैक्ट्रम घोटाला फ़ाइल बंद

जी हां ये सच है। मैं ये दावे के साथ कह सकती हूं। ये सूचना उन सभी भारतवासियों के लिए है जो सोच रहे हैं कि २ जी स्पैक्ट्रम घोटाले की छानबीन का कुछ नतीजा निकलेगा या निकलने वाला है। कुछ नहीं होने वाला देश के सबसे शर्मनाक इस घोटाले का। बाकी सभी घोटालों की तरह ये भी सांठगांठ की भेंट चढ़ जाएगा। कोई भी समझदार भारतीय ये बात आसानी से समझ सकता है कि भैंस के आगे बीन बजाने से कुछ नहीं होने वाला। आखिर क्या हुआ भोपाल गैस कांड का, या फिर क्या हुआ रक्षा सौदों से जुड़े तहलका खुलासे का या फिर गोधरा कांड के पीछे छिपे असली दरिंदों का। और फिर भई स्पैक्ट्रम घोटाले में तो खबरों की खबर लेने वाले मीडिया के ही कुछ दिग्गजों के दिमाग भिड़े हुए हैं तो फिर इसका तो कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस शर्मनाक घोटाले में साफ सुथरी छवि रखने वाले हमारे भोले भाले प्रधानमंत्री का नाम भी सीधे-सीधे उछला है। उन्हीं के मंत्रालय की तरफ से लिखी गई चिठ्ठियां सार्वजनिक कर दी गईं हैं। तो फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये रहा कि आखिर जवाब देगा कौन और अपराधियों से जवाब लेगा कौन ? जनता के पैरोकार कुछ मीडियाकर्मी आज खुद सवालों के घेरे में हैं। राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मी और कॉरपोरेट सेक्टर की ये नापाक सांठगांठ एक घिनौने भ्रष्ट समाज की तरफ इशारा करती है। वो समाज जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई सत्ता के केंद्र में बैठे लोग मिलबांट कर मजे से उड़ा रहे हैं। छि: घिन्न आनी चाहिए हर भारतीय को इस गंदी सांठगांठ से। और सभी को मिलकर इन चुंनिंदा गंदी मछलियों को लोकतंत्र की पावन नदी से निकाल कर दूर फैंक देना चाहिए। ताकि ये किनारे पर सड़कर अपनी गति को प्राप्त करें।

Thursday, November 25, 2010

मां की याद में


... पहली बार महसूस हुआ कि तकनीक ने दुनिया कितनी बदल दी है। वेंटिलेटर की मदद से पता ही नहीं चलता कि आपके अपने ने कब संसार से विदा ले ली... कब आपको अलविदा कह दिया। वेंटिलेटर में डाली गई दवाओं के प्रभाव से वो अंत तक सांस लेती रहीं... लेती रहीं। मैं देखती रह गई और माजी ने मेरे सामने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सकी। डॉक्टर ने बताया कि वो जा चुकी हैं। मैं सन्न रह गई। वो लम्हा कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके साथ वो मेरी दुनिया भी ले गईं। मुझे बहू से बेटी बनाया उन्होने और अपनी बेटी को छोड़कर चलीं गईं वो। उसके बाद मुझे दुनिया की तमाम उन सच्चाईयों से रूबरू होना पड़ा जिनको देखकर, सुनकर मैं दुखी कम आश्चर्यचकित ज्यादा थी। माजी के जाने के बाद उनकी तेरहवीं के लिए मुझे बिहार अपने ससुराल जाना था। माजी के बिना घर सूना था, बहुत सूना। लेकिन जिस तरह से उनके जाने के तुरंत बाद आस-पड़ोस के लोगों, यहां तक कि अपनों ने जो व्यवहार किया वो बहुत अजीब था। सबकी आंखों में दुख कम एक अजीब सी बेचैनी देखी मैने। इंसान के जाने के बाद रीतिरिवाजों से घिरी दुनिया का आडंबर देखकर मन व्यथित हो उठा। पता नहीं किसने ये रिवाज बनाए जो जिंदा बचे सदस्यों को परेशान कर देते हैं। किसी चीज में मेरा बस नहीं था सो जो सबने कहा मैने किया। खैर, घर की मालकिन के जाने का दुख घर के हर कोने में था। हर खिड़की से झांकता मेरा अतीत मेरे वर्तमान पर हंसता नज़र आया। हर दीवार, हर बर्तन पर माजी की छाप थी। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि माजी हमेशा जिंदा रहेंगी। हमारी यादों में, हमारी बातों में और उस अहसास में जो वो आखिरी वक्त में हमें देकर गईं। वो जहां भी हों, खुश और शांत रहें।

Saturday, October 9, 2010

एक रात की बात

... पुतलियां डगमगाई तो देखा कि कालिख पुती वो रात चल बसी। ना जाने और क्या क्या हुआ उस रात। भर रात जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों से पर्दा नुचता गया। हां मैने देखा खुद अपनी आंखों से... मौत से जिंदगी की भीख मांगती सांसों को। उस रात हम अपने मरीज के साथ हर हॉस्पिटल की चौखट पर गए लेकिन बीमार बिलबिलाती भीड़ से अस्पताल पटे पड़े थे। क्या पता था कि रात की चादर में कितने कांटे बिछे हैं। आखिरकार आरएमएल में शरण मिल ही गई। इमरजेंसी का वो दृश्य आज भी आंखों में तैर जाता है। स्ट्रेचर पर अधजली हालत में कुछ ढका, कुछ खुला सांसे लेता वो शरीर, खून से लथपथ वो आदमी, कराहती सिकुड़ी वो बुढ़िया और बदहवास तीमारदार। हमारे सामने वाले स्ट्रेचर पर एक बूढ़ी के हाथ-पैर दबाता उसका हमसफर बार बार ऊंघ रहा था। क्या करे बेचारा रात का वो पहर आमतौर पर नींद में गोते लगाने का ही होता है लेकिन अचानक पत्नी को पैरालाइसिस का अटैक पड़ गया। सो ना जाने कब से अपनी रोती बिलखती पत्नी के अंगों को दबाकर उसे शांत करने की असफल कोशिश में जुटा था। इंजैक्शन और दवाई की बदबू से मन भारी हो गया। सुबह से ही परेशान मन कहीं पलभर बैठने की जगह ढूंढने लगा लेकिन वहां उस माहौल में ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीबवालों को ही मिल रही थी। कई बदकिस्मत ऐसे भी थे जिनको इमरजेंसी में घुसने का मौका तक नहीं मिला। वो लोग बाहर बैठे लाचार तरसती नजरों से जगह खाली होने का इंतजार कर रहे थे। बीमारों को आसरा अस्पताल का और अस्पताल खचाखच भरे हुए। एक अदद स्ट्रेचर की तलाश में तीमारदार लगातार बस भाग रहे थे। गुमसुम घबराए सभी चेहरे एक बूंद आंसू बहाने को वक्त तलाशते दिखे लेकिन मरीज को कुछ हो ना जाए, इसकी चिंता रोने की इजाजत भी नहीं दे रही थी। इस सब के बीच अचानक जोर से चिल्लाने की आवाज आई। और फिर कई आवाजें एक साथ मिल गईं। मैं भागकर उस दिशा में गई तो पांव फर्श पर जम गए। आंखे पथराईं और जीभ बाहर... एक शरीर से सांस टूट चुकी थी। अब तो घबराहट अपने चरम पर थी।
खैर कई घंटों बाद हमारे मरीज को एक वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन चैन को भी चैन ना था उस रात। अभी शिफ्ट हुए ही थे कि धड़धड़ाते हुए तीन डॉक्टर्स वॉर्ड में घुस गए और १५-१६ साल के बच्चे की छाती को दबाकर पंप करने लगे। बच्चे की सांसे लगभग जा चुकी थीं फिर भी डॉक्टर्स की कोशिश लगातार जारी थी। जिंदगी और मौत की ऐसी जंग पहली बार देख रही थी। 10 मिनट तक ये सिलसिला जारी रहा. पंप... पंप... पंप और फिर... सांस लेने की आवाज। आखिरकार बच्चे की सांसे वापस आने लगीं मतलब जिंदगी जंग जीत गई। इस बीच अचानक घड़ी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सुई पांच पर अटकी हुई थी। मैं इमरजेंसी के बाहर निकली। सुबह अंगड़ाई ले रही थी। अपनी चिर परिचित खुशबू के साथ अलसाए संसार में जान फूंक रही थी। लंबी लंबी सांसें भरने के बाद मैं दोबारा इमरजेंसी के अंदर गई तो लगा कि नजारा बदल चुका है। धीरे धीरे वहां शांति ने डेरा जमाना शुरू कर दिया था। फर्शों की सफाई हो रही थी, कई मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका था। जिनके अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया था वो भी रात भर रोकर अब आगे की कार्रवाई को शांति से निपटाने में व्यस्त थे। लगा कि इस सुबह का कितनी देर से इंतजार था मुझे। शांत, शीतल और सात्विक.

Sunday, September 12, 2010

... और खोज जारी है

तन्हाई के इस पार, उस पार
झांकू मैं आखिर कितनी बार
मालूम है कि आंचल फैलाए
खड़ी है तू इंतजार में
रास्ता छोटा पर दूरी बड़ी है
मन से बाहर, व्याकुल मन से बाहर
आता नहीं क्यों वो
खुद बाहर आता नहीं
ना आने देता भीतर तुझे
जम गया अवसाद है शायद
रिस रिस कर टपकता है शायद
शांति, संतुष्टि या निजता के पलों को
तन्हाई के तरन्नुम में खोजता मन
खुशियों के पलों में दुख को
खोदता, टटोलता अंशात मन
वो कुछ जो ना मिल सका

उस कुछ की खोज में
नित नई खोज पर निकला
तन्हा, बावरा मेरा मन



Thursday, September 9, 2010

आ जाए तू अगर...

अधूरी कहानी छोड़ी थी वहां
एक सिरा मिल जाए तो बस
बात बन जाए
कसमसाती धड़कनें चलने लगें
तू आवाज दे तो बस
बात बन जाए
क्यूं ढांक दूं मैं ये जख्म
तेरे प्यार ने जो दिया
तू आकर इसे छू जाए तो
बस बात बन जाए
सब सपने, वादे, इरादे
देख धुंधलाने लगे हैं
अपने अहसास से इन्हें
छंटा दे तो बस
बात बन जाए
वक्त अभी भी है जीने को
बस तेरा साथ मिल जाए
तो बात बन जाए

Friday, August 27, 2010

ममता मतलब मां

मां, खुद में परिपूर्ण है ये शब्द। इस शब्द को सुनकर ही मन में आस्था, प्यार और ममता एक साथ हिलोरे लेने लगते हैं। शादी से पहले मेरे लिए मां सिर्फ और सिर्फ जन्म देने वाली कोख का ही नाम था। क्या करूं कि समझ ही इतनी थी। लेकिन विवाह के परिणय सूत्र में बंधने के बाद मस्तिष्क कुछ और खुला। रिश्तों के मायने कुछ और समझ आने लगे। मन की गांठ ढीली पड़ने लगी और मां शब्द का सही अर्थ समझने लगी मैं। शादी के बाद अपना घर परिवार रिश्ते-नाते छोड़कर एक बिल्कुल नए परिवेश में जाकर समाना इतना आसान नहीं होता। लेकिन वहां(मेरे ससुराल में) भी मुझे एक मां मिली। बहुत प्यार करने वाली और मेरा बहुत ख्याल रखने वाली, मेरी सासू मां। आज मेरे लिए मां महज जन्म देने वाली नहीं बल्कि ममता का दूसरा नाम ही मां है। मेरी सासू मां की तबीयत बहुत खराब है, उनका शरीर भी धीरे-धीरे ढलने लगा है। जीवन को समझने का एक नया नजरिया जिसने मुझे दिया वो आज खुद जीवन से हार मान बैठी हैं। सिर्फ उनके जरिए मैने जाना कि आखिर कैसे पराये अपने हो जाते हैं। आखिर क्यों उनके दुख से आपकी आंखे भर आती हैं। मेरी सासू मां ने बहुत कम समय में ही मुझे वो सब कुछ सिखाया जो ताउम्र जीवन को सुगम और सफल बनाने में मेरी मदद करेगा। और सबसे बड़ी चीज जो उन्होने मुझे सिखाई वो है संवेदनशीलता और सब्र, जो परिवार को चलाने के लिए एक बड़ी पूंजी है। बहुत बीमार होने के बावजूद आज भी वो जब लड़खड़ाती जुबान से मुझसे पूछती हैं कि कंचन खाना खाया क्या... बस आंखें नम हो जाती हैं। मां आप जल्दी से ठीक हो जाएं बस ईश्वर से यही एक चीज मांगती हूं...

Sunday, August 22, 2010

जिंदगी ए जिंदगी

जिंदगी तेरे आगाज पर
मैं फिर से जीने लगी हूं
अब अंजाम तू ही देखना
रात की बाहों में पला सपना
भोर के उजास में पैरों तले
कुचला ना जाए, तू देखना
हौसलों से सींचीं मन की बगिया
कहीं बागबां की ठोकर से
उजड़ ना जाए, तू देखना
देखना कि स्वाभिमान की सांसें
यूं ही चलती रहें निरंतर
देखना कि अच्छाई की डगर से
पैर फिसल ना जाए किसी पल
तू ही देखना तुझ पर मेरा भरोसा
कोई लुटेरा ना लूट जाए कहीं
दे गर तू लाख मुश्किलें
तो समझदारी का अमृत भी
मुझ प्यासे रेगिस्तान में हो
तू देखना ए जिंदगी

Thursday, August 12, 2010

भौजी की प्यारी हिंदी

ई तो हद हो गई, हटटटट... बोलते हुए भौजी ने रेडियो का कान जोर से घुमाकर, बंद कर दिया। और पटक दिया एक कोने में। बडबड़ाती हुई भौजी ने चौखट से बाहर कदम रखा ही था कि मैं पहुंच गई, भौजी के हाथ की गरमागरम चाय पीने। भौजी का मूड देखते हुए अपनी मंशा मन में ही दबाते हुए मैने पूछा-

क्यों भौजी कैसी हो? वैसे ठीक तो नहीं लग रही। क्या बात है?

मुंह बनाते हुए भौजी बोली- का बोलें। हिंदी का तो ई लोग बैंड बजा दिए हैं। पहले ईंग्लिश बोलते थे, फिर मुई हिंग्लिश आ गई और अब स्वाधीनता दिवस के अवसर पर सिर्फ और सिर्फ हिंदी बोलने की जिद ठाने बैठे हैं। ये तो वही बात हुई कि ढाबे में वो क्या कहते हैं महंगा विदेशी खाना परोसा जाने लगा है।

मुझे समझ में नहीं आया कि भौजी आखिर नाराज हैं क्यों। भौजी तो हिंदी भाषा की बड़ी हिमायती बनती हैं। मुझे असमंजस में देखकर वो बोली

अरे आजकल एफएम पर हिंदी बोलो आंदोलन चल रहा है। रेडियो वाले हिंदी के शुद्ध शब्द बोलने की कोशिश कर रहे हैं। गधे कहीं के। मोबाइल, टेलीफोन और माइक जैसे शब्दों को भी शुद्ध हिंदी में बोलने की अजीब जिद है। मैं पूछती हूं कि क्यों। आखिर जिन शब्दों को हिंदी भाषा ने खुद में घुला मिला लिया है उन्हें शुद्ध हिंदी में बोलने की जरूरत ही क्या है भला। और फिर ये शब्द बोलने में थोड़ा लंबे और मुश्किल भी हैं।

मैने कहा- हां, भौजी बात तो पते की है। संस्कृत भाषा भी तो इसलिए ही लुप्त हो गई क्योंकि ये हमेशा से ही देवभाषा रही। जनसाधारण की भाषा कभी बन ही नहीं पाई। जनता ने तो उसी भाषा को गले लगाया जिसे बोलने और समझने में उसे परेशानी नहीं आई। जैसे हिंदी। और फिर वक्त के साथ-साथ हिंदी का स्वरूप बदला और हिंदी में उर्दू, फारसी और ईंग्लिश के शब्द समाहित होते गए।

भौजी बोली- इही बात तो हम भी कह रहे हैं। अरे भई एफएम वालों को अपने फोन और एसएमएस से मतलब हैं। हिंदी का भला वो क्या अचार डालेंगे। नाहक ही स्वाधीनता दिवस और हिंदी का मजाक बना के रख दिए हैं। स्वाधीनता दिवस का खुमार उतरा नहीं कि फिर अपनी हिंग्लिश भाषा पर उतर आएंगे। हिंदी किसी के बोलने और ना बोलने की मोहताज थोड़े ही है। हम ये भाषा बोलते हैं क्योंकि इस देश में रहने के नाते ये हमें अपनी सी लगती है। और ईंग्लिश का क्या है। ईंग्लिश तो पैसे कमाने वाली लुगाई की तरह है। उससे प्यार तो करना ही पड़ेगा। कोनो चारा भी तो नहीं है।

मैने कहा- सोलह आने सच बात है भौजी। ये सब तो सरकार को सोचना चाहिए ना। अगर सारा सरकारी काम चीन या जापान की तरह अपनी मातृभाषा में किया जाता तो आज हिंदी की ये दुर्दशा नहीं होती।

मैने बात खत्म भी नहीं की थी कि भौजी हाथ में चाय का प्याला लेकर मेरी तरफ बढ़ी और बोली- काश हिंदी को लोग मजबूरी नहीं, गर्व समझकर अपनाते तो कितना भला होता। और मैं चाय की चुस्कियों के साथ भौजी की कही बात के मर्म में डूब गई।

Thursday, August 5, 2010

... बात समझ में आई कि नहीं

लो जी इन्हें अब पता चला है। मुझे तो ये बात पहले से ही पता थी कि महिलाएं अच्छी पायलट भी हो सकती हैं। और फिर सपनों की उड़ान को महिलाओं से बेहतर गति कौन दे सकता है। पायलटों के सलेक्शन के लिए देश में एक कम्प्यूटराइज्ड मशीन बनी है जिससे ये साबित हुआ है कि महिलाएं पुरुषों से बेहतर उड़ान भर सकती हैं। वैसे एक बात बताऊं ये कम्यूटर-वम्प्यूटर तो अब हुआ है ना। अरे ये मशीन क्या खाक महिलाओं के व्यक्तित्व का खाका खींचेंगीं जब खुद ईश्वर ने ही महिलाओं को एक नायाब तोहफे से नवाजा है। और वो है एक जिंदगी को इस संसार में लाना। है पुरुषों में इतनी ताकत हो तो ये कर के दिखाएं बिना विज्ञान के सहारे। बच्चे को पैदा करने से लेकर उसे पालना, उसकी देखभाल करना क्या कम बड़ा काम है। आज सुष्मिता सेन जैसी सिंगल मदर का कॉन्सेप्ट जब सबके सामने है तो फिर हवाई जहाज उड़ाना क्या बड़ा काम है। महिलाओं को अगर पुरुषप्रधान समाज का शिकार ना होना पड़ता तो मैं कहती हूं कि पुरुष उनके सामने पानी भरते नजर आते। उस पर भी ये महिलाओं का बड़प्पन ही है कि वो आगे नहीं साथ-साथ चलना ही पसंद करती हैं। भारत में अब ये बात शायद समझ आने लगी है कि औरत सिर्फ बच्चा जनने की मशीन भर नहीं है उसमें दिमाग और ताकत दोनों ही है। मैं मानती हूं कि औरतों रचना उन्हें पुरूषों से थोड़ा कमतर ताकतवर बनाती हैं लेकिन मानसिक ताकत उस सब के पार है। तभी तो औरतों को सेना में बड़ी पोस्टों के लिए तैयार किया जा रहा है। अब बताइये औरत कहां नहीं है। घर के किचन से लेकर युद्ध के मैदान में भी वो कल नजर आए तो आश्चर्य क्या। और क्या पता औरतों के सरकारी नौकरी में रहने से भ्रष्टाचार के दलदल से कुछ कीचड़ ही कम हो जाए। पुरुषों के विरोध में ना जाकर मैं एक और बात जरूर कहना चाहूंगी कि अगर कोई औरत सुरेश कलमाड़ी की जगह भारतीय ओलंपिक महासंघ की अध्यक्ष होती तो भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स का डंका पीटने के बजाय यकीनन एक बार राष्ट्रीय और स्थानीय खेलों या खिलाड़ियों की दुर्दशा के बारे में जरूर सोचती। औरत सबकुछ कर सकती है ये तो मैं नहीं कहूंगी क्योंकि पुरुष और औरत ही मिलकर समाज का निर्माण कर सकते हैं लेकिन समाज में बराबरी का हक और उचित दर्जा उसे मिलना ही चाहिए। और जितना जल्दी मिल जाए वही लोक कल्याण के लिए बेहतर विकल्प है।

Saturday, July 31, 2010

अफसोस है...

जख़्म गहरा है
चोट अपनों ने की
दिल छलनी हुआ
पर आंखों में पानी नहीं
पीड़ा बनी अवसाद
जमा होती रही
पता ही नहीं चला
और फिर एक दिन
विश्वास टूट गया
टूट गया जब
तब अहसास हुआ
कि रेत से बना मेरा
घरौंदा बिखर चुका
सपनों के मोती
यहां, वहां पड़े हैं
कौन समेटे अब कि
हिम्मत टूट गई
जख़्म गहरा है, बहुत गहरा

Wednesday, July 7, 2010

ससुरी महंगाई और हमार भौजी

सखी सइंया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाए जात है
अपने आमिर भाई की नई फिल्म का गाना है... भई गाना सुनके हम तो हो गए चित। कमाल है भइया। वैसे कमाल तो हमारी गली में रहने वाली भौजी भी है। हमारे साथ भौजी ने भी ये गाना सुना। अजी गाना क्या सुना, भौजी के दिल को छू गया। बस हर दूसरे भजन कीर्तन के समापन पर यही गाना गाया जाता है। नहीं नहीं मैं आमिर की नई फिल्म की डिस्ट्रिब्यूटर नहीं हूं, मैं तो आपको वो कमाल का वाकया सुनाने जा रही हूं जो इस गाने से जु़ड़ा हुआ है। अब हुआ यूं कि कल भौजी ढोलक की थाप पर जब महंगाई डायन को कोस रही थीं तो अचानक दरवाजे पर खूब सजी संवरी कड़क सूती साड़ी में एक महिला आकर खड़ी हो गई। वो कौन है क्या काम है भौजी समेत सभी औरतें ये तो बाद में पूछतीं, पहले तो नजर उसकी साड़ी, उसकी महंगे कीमती गहने और उसके पर्स पर जाकर टंग गईं। उनके मुंह खोलने से पहले ही वो औरत चिल्लाने लगी
- मैं कहती हूं किसने कहा मुझे डायन. किसकी इतनी हिम्मत हुई। अभी तो मेरे एक वार से सिर्फ कमर ही टूटी है ज्यादा चूं-चपड़ की ना तो हमेशा के लिए बिस्तर पर बिठा दूंगी... महंगाई है मेरा नाम हां...
भौजी की प्यासी नजरों ने जब मन भर कीमती गहनों और कपड़ों का स्वाद चख लिया तो होश आया। वो भी गुर्राने लगी

- अच्छा तो मुई तू है वो महंगाई। तभी मैं कहूं इस जमाने में इतने कीमती गहने और ये सजीला पर्स कहां तो आया। पहले से ही मुसीबतें कम थीं जो ससुरी तू भी आ गई जान खाने को।

महंगाई - क्या... मुझे गाली दी। तुम्हारी इतनी हिम्मत। अब देखो जरा डीजल, पैट्रोल तो पहले ही तुम फटीचरों की जेब से दूर चला गया है अब पानी, बिजली को भी तरसोगे तुम।

भौजी- अरे जा जा तेरी इतनी औकात कहां। ये तो भला हो दिल्ली सरकार का जिसने सब्सिडी हटाकर पानी बिजली हम गरीबों के लिए महंगी कर दी वरना इसका श्रेय भी तुझ डायन को ही जाता। और तू क्या हमको मसलेगी री, पहले तो घर से निकलते ही मोहल्ले के बेरोजगार लड़के ही जेब पर हाथ साफ कर देते हैं। या फिर सड़क पर चलते हुए तरह तरह के मजहबी विस्फोट से कब घर का कमाईदार चल बसे कुछ ठीक नहीं। ससुरी किस्मत अच्छी हुई और आदमी बच जाए तो जगह-जगह खुदी सड़कों और गड्डों से कइसे बचेगा। और गर किस्मत में ही छेद हो और जिंदगी बची रहे तो रहा सहा तेल तो इश्क का भूत ही उतार देत है। कर के देख लो जरा मां-बाप की मरजी से प्यार महोब्बत बस जान खुंखरी पर समझो। ई सब से कोई बच जाए तो हम रामदुलारी के घर महरी बन जाएं कसम से। तुम्हारा नंबर तो ए सब के बाद आवत रहै समझी. और ऊ भी तब जब कि हम सब महोल्ले की औरतें शीला बहन के घर रात को टीवी पर नाटक ना देख लें। कसम से ससुरा इतना रुलात है इतना रुलात है कि कौनो और चीज सोचने का मन ही ना करे। बाकी रहा सहा तुम मसल लो मौज से।

महंगाई- साला किस्मत से ही खोटी हो तुम सब। तुमको क्या लूटा जाए। लुटे लुटाए हो। बजाओ यार, बजाओ... आज मैं भी झूमके नाचूंगी। तुम सब की बर्बादी पर।
और फिर क्या... भौजी के ही मुंह से सुना वो डायन महंगाई ढोल की थाप पर खूब जमके नाची। और जाने कैसे लेकिन नाचते नाचते उसका आकार लगातार बढ़ रहा था।

Wednesday, June 30, 2010

ये क्या हुआ ?

न उनको हमसे परेशानी
ना हमको उनसे शिकवा
बस बात नहीं होती अब
ना नजरों से ना जुबानी

ना खैर पूछते, ना बताते ही खता
कल, परसों फिर आज भी किया
रोजाना करते हैं रह रह कर हम
उनसे ख्वाबों में गिला
हम समझ नहीं पाते, ना वो कह पाते
कह पाते कि क्यों है हालात यूं ख़फ़ा
कहने को है ही क्या, जानते हैं माजरा सारा
कि आसार अच्छे नहीं, वहां भी यहां भी
दूर थे तो पास आने की थी बेकरारी
बेगानी सी लगती थी कायनात सारी
पर अब क्या ?
पास हैं तो...
नजदीकियां दम घोंटने लगी हैं

Tuesday, June 29, 2010

शब्दों का संसार

शब्द जो खींचकर पीछे ले जाएं
शब्द जो नाचने लगें पन्नों पर
जो अहसास हैं उस पल का

जब हर क्षण यादों की माला में
गुंथ रही थी मेरी दुनिया
शब्द जो बचपन के साथ मुस्कुराएं
तुतलाएं जिंदगी में घुलमिल जाएं
यादों की बारात ले आएं
निच्छल हंसी के लम्हे
जब सब कुछ नया-नया सा
अजीब अनोखा था
वो अहसास अनमोल है

अपने शहर से दूर जाने का अहसास
पहली नौकरी का अहसास
पहले प्यार का अहसास
अहसास विविधता में एकता का
या फिर एकता के ढोंग का

वो अहसास बंद है डायरी के पन्नों में
पन्ने खोलते ही शब्द नाचने लगते हैं
और वो खोये लम्हे, वो बीते पल
खुद को दोहराने लगते हैं
तब, मन हरा हो जाता है
और पलकें नम

Sunday, January 17, 2010

सुख... का सवाल

... सोचती हूं, सुख क्या है? सपनों का महल मिल जाना, ऊंची पगार वाली नौकरी, नाम, रुतबा या फिर प्रेमी से मिलन। आखिर क्या है सुख। कभी जिस उद्देश्य के पीछे मन बहुत देर से भाग रहा होता है और वो चीज हाथ में आ जाए तो मन खुश लेकिन फिर दूसरा उद्देश्य, कुछ और चाहत और एक नई मंजिल।
कहां ना जाने कहां भागता है मन। कभी किसी के टॉप क्लास ब्रांडेड कपड़ों में अटक जाता है तो कभी किसी के खूबसूरत घर पर... तो कभी लगता है कि कोई खास आपकी भावनाओं को बिन बोले ही समझ जाए। और ना समझे तो खीझ और झुंझलाहट से मन भर जाता है। यार इतनी इच्छाएं करता ही क्यों है मन। भौतिकवाद है, सब समझते हैं लेकिन ये जो मन है ना मानता ही नहीं। सब चाहिए इसे सब तब भी अधूरा, खाली खाली सा और प्यासा ही दिखता है। बस भागता रहता है एक को छोड़कर दूसरे की तरफ और दूसरे से ना जाने कहां-कहां? आकांशाओं और इच्छाओं की अंधाधुंध दौड़ आखिरकार अंधकार में पटक देती है... बहुत समझदार होते हुए भी शायद खुद से या दूसरों से लगाई गई अति इच्छाओं के बोझ से बौरा जाता है ये मन। अकेलेपन की कीचड़ से सना शरीर और अवसाद भरा मन लिए फिर इंसान कहीं जाने के लायक नहीं रह जाता। पहले तो उसे सामने खड़ी खुशी नहीं दिखती है बेकाबू मन को खुले सांड की तरह यहां वहां दौड़ने की छूट दे दी जाती है और फिर जब मन संभाले नहीं संभलता तो धोबी का कुत्ता बन जाते हैं। मेरे ख्याल से भागते मन का एक ही तोड़ है संतुष्टि। संतुष्ट रहकर पल पल का मजा लीजिए। जो है उसी में खुश रहिए। लेकिन फिर सोचती हूं कि संतुष्टि विकास के रास्ते में रोड़ा ना बन जाए। भई अब ये आपके ऊपर है कि कितना संतुष्ट रहकर आप विकास की गाड़ी में धक्का लगा सकते हैं... खैर... लगता है बहुत सोचती हूं... ना सोचूं भी तो क्या, कुछ नहीं लेकिन फिर मन में फंसी गांठ मुझे ही छीलकर रख देगी...